एक अहम व्यापारिक फ्रेमवर्क तैयार
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों को नई दिशा देने के लिए एक 'अंतरिम व्यापार समझौता' (Interim Trade Agreement) फ्रेमवर्क तैयार किया गया है। यह समझौता, फरवरी 2025 में लॉन्च हुए एक बड़े बायलैटरल ट्रेड एग्रीमेंट (BTA) फ्रेमवर्क पर आधारित है। इसके तहत, दोनों देशों के बीच टैरिफ (Tariff) को लेकर आपसी समायोजन होगा और नॉन-टैरिफ बैरियर्स (Non-tariff barriers) को भी संबोधित किया जाएगा। भारत जहाँ अमेरिकी इंडस्ट्रियल और एग्रीकलचरल प्रोडक्ट्स पर टैरिफ कम करेगा, वहीं अमेरिका चुनिंदा भारतीय एक्सपोर्ट्स पर 18% का रेसिप्रोकल टैरिफ (Reciprocal Tariff) लगाएगा। यह पहले के करीब 50% के मुकाबले एक बड़ी कमी है, जिसने पहले व्यापारिक रिश्तों को काफी प्रभावित किया था। हालांकि, अमेरिका से अगले पांच सालों में 500 अरब डॉलर के सामान खरीदने का 'इंटेंट टू परचेज' (Intent to Purchase) कोई बाइंडिंग कमिटमेंट नहीं है, और यह अमेरिकी प्रोडक्ट्स की कीमत और भारत की बदलती व्यावसायिक जरूरतों पर निर्भर करेगा।
एविएशन सेक्टर में बूम, लेकिन कुछ शर्तें!
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत के तेजी से बढ़ते सिविल एविएशन मार्केट की ओर इशारा करते हुए कहा कि एयरक्राफ्ट, इंजन और स्पेयर पार्ट्स जैसे संबंधित प्रोडक्ट्स की डिमांड 80 से 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। बोइंग (Boeing) के साथ 50 अरब डॉलर के मौजूदा ऑर्डर्स इस अनुमान को मजबूती देते हैं। वैश्विक स्तर पर भी, अमेरिकी एयरोस्पेस पार्ट्स मैन्युफैक्चरिंग मार्केट 2030 तक 476 अरब डॉलर के आंकड़े को छू सकता है, हालांकि इसकी अनुमानित ग्रोथ रेट 1.7% CAGR के आसपास रहने की उम्मीद है। समझौते के तहत कुछ एयरक्राफ्ट पार्ट्स पर टैरिफ पूरी तरह खत्म हो जाएंगे, पर वहीं, बोइंग जैसी कंपनियों के P/E रेश्यो में उतार-चढ़ाव (जैसे फरवरी 2026 में 95.16 TTM) निवेशक की सतर्कता या लंबी अवधि की रिकवरी पर फोकस दिखा रहा है। कुल मिलाकर, एविएशन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में वैश्विक स्तर पर ग्रोथ स्थिर लेकिन बहुत आक्रामक नहीं रहने की संभावना है।
डिजिटल इकोनॉमी से ICT की बढ़ती मांग
भारत में डेटा सेंटर एक्सपेंशन (Data Center Expansion) और AI डेवलपमेंट के चलते इंफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी (ICT) प्रोडक्ट्स की मांग में जबरदस्त उछाल आने की उम्मीद है। फिलहाल, भारत सालाना 300 अरब डॉलर का ICT इम्पोर्ट करता है, और अगले पांच सालों में यह आंकड़ा 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। भारत का IT इंडस्ट्री 2026 तक 350 अरब डॉलर के बड़े स्तर पर पहुंच जाएगा और देश की GDP में 10% का योगदान देगा, जबकि कुल IT स्पेंडिंग 2026 में 176 अरब डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है। ऐसे में, अपनी उन्नत तकनीकों के साथ अमेरिका इस बढ़ती मांग को पूरा करने में एक महत्वपूर्ण सप्लायर के रूप में उभरेगा। भारत की अनुमानित 7.4% GDP ग्रोथ (2025-26) भी देश की बढ़ती इम्पोर्ट कैपेसिटी को दर्शाता है।
एक्सपोर्ट पर दबाव और फायदे-नुकसान
इस नई व्यापारिक व्यवस्था में कुछ चुनौतियां भी छिपी हैं, खासकर भारतीय एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड इंडस्ट्रीज के लिए। अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर लगाया गया 18% का टैरिफ, भले ही पहले के मुकाबले काफी कम हो, लेकिन यह टेक्सटाइल्स, अपैरल और लेदर जैसे सेक्टर्स को बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले कॉम्पिटिटिव डिसएडवांटेज (Competitive Disadvantage) में डाल सकता है, जहाँ टैरिफ बहुत कम हैं। अतीत में, अमेरिकी टैरिफ्स ने भारत के एक्सपोर्ट इंजन को चोट पहुंचाई थी, जिससे GDP ग्रोथ पर 0.2-0.5% का असर पड़ने की आशंका थी और इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट्स को 4-5 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता था। साथ ही, 500 अरब डॉलर की खरीद का इरादा केवल एक 'इंटेंट' है, न कि कोई बाइंडिंग कमिटमेंट। इसके अतिरिक्त, भारतीय रुपये के कमजोर होने से इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन (Imported Inflation) की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। हालांकि, इस खबर से शेयर बाजार में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है, जहाँ निफ्टी (Nifty) 2.8% तक चढ़ा, जो व्यापारिक अनिश्चितता कम होने का संकेत देता है।
आगे का रास्ता और नीतिगत मायने
यह अंतरिम समझौता एक व्यापक बायलैटरल ट्रेड एग्रीमेंट (BTA) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, और भविष्य में मार्केट एक्सेस (Market Access) जैसे मुद्दों पर और बातचीत होने की उम्मीद है। अमेरिका ने भारतीय सामानों पर और टैरिफ कम करने की मंशा भी जताई है। फार्मास्यूटिकल्स, जेम्स और डायमंड्स जैसे प्रमुख सेक्टर्स पर टैरिफ पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे, जिससे उन्हें सीधा लाभ मिलेगा। ICT और एविएशन सेक्टर्स के लिए, इस समझौते ने व्यापार की शर्तों को स्पष्ट किया है, जिससे भारत के बढ़ते इम्पोर्ट मार्केट में अमेरिकी भागीदारी को बढ़ावा मिल सकता है। इस फ्रेमवर्क की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है और भारतीय इंडस्ट्रीज नए टैरिफ परिदृश्य में अवसरों का लाभ कैसे उठा पाती हैं।