Ministry of Road Transport and Highways ने NH-44 पर एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसमें प्लास्टिक का इस्तेमाल करके सड़क बनाई जा रही है। IIT (BHU) द्वारा विकसित इस तकनीक से Bitumen की खपत में **4%** और कुल मटेरियल लागत में **20%** तक की बचत होने का अनुमान है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (Ministry of Road Transport and Highways) ने झांसी के पास NH-44 पर एक अनोखा प्रयोग शुरू किया है। इस प्रोजेक्ट में सड़क बनाने के लिए 'वेट-मिक्स प्लास्टिक Bitumen तकनीक' (W-PMB 76-10) का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें कचरे से निकले प्लास्टिक को सीधे Bitumen में मिलाया जाता है। यह तरीका पुरानी ड्राई-मिक्सिंग पद्धति से कहीं ज्यादा बेहतर है, क्योंकि यह सड़क की केमिकल बाइंडिंग और मजबूती (Stiffness) को बढ़ाता है।
कंस्ट्रक्शन सेक्टर के लिए राहत
भारतीय सड़क निर्माण कंपनियों के लिए Bitumen एक बड़ा खर्च है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से इनके मार्जिन पर असर पड़ता है। भारत Bitumen का बड़ा आयातक है, ऐसे में अगर यह तकनीक सफल रहती है, तो कंपनियों के मार्जिन में 20% तक का सुधार हो सकता है। यह कदम निवेशकों के लिए उन कंपनियों पर नजर रखने का एक बड़ा मौका है जो इस नई तकनीक को अपनाकर अपनी लागत घटा सकती हैं।
तकनीकी चुनौतियां और रिस्क
हालांकि यह प्रयोग लागत कम करने का वादा करता है, लेकिन इसकी असल परीक्षा भविष्य में होगी। मुख्य चुनौती इस्तेमाल किए गए प्लास्टिक की क्वालिटी को मेंटेन करने की है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि तापमान का सही प्रबंधन नहीं हुआ, तो एयर पॉल्यूशन या माइक्रोप्लास्टिक का खतरा हो सकता है। साथ ही, भारी ट्रकों के ट्रैफिक और भारत की बदलती जलवायु परिस्थितियों में यह नई सड़क कितनी टिकाऊ साबित होगी, यह सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है।
आत्मनिर्भरता की ओर कदम
यह पायलट प्रोजेक्ट सरकार के उस विजन का हिस्सा है जिसके जरिए आयात पर निर्भरता कम की जा सके। जिस तरह ग्रीन हाइड्रोजन और इथेनॉल पर जोर दिया जा रहा है, उसी तर्ज पर अब कचरे का इस्तेमाल निर्माण कार्यों में करके देश को 'आत्मनिर्भर' बनाने की कोशिश है। अगर यह परीक्षण सफल रहा, तो देशभर में सड़क निर्माण के मानकों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जिसका सीधा असर निर्माण कंपनियों के बिडिंग प्रोसेस पर पड़ेगा।
