भारत सरकार ने देश भर में बैरियर-फ्री और मल्टी-लेन फ्री-फ्लो टोलिंग सिस्टम लागू करने की योजना बनाई है। मार्च 2027 तक इस बदलाव से सरकारी खजाने में सालाना **₹25,000 करोड़** तक की अतिरिक्त आय होने की उम्मीद है। FASTag और आधुनिक कैमरों के मेल से टोल कलेक्शन का खर्च **12-15%** से घटकर केवल **2-4%** रह जाएगा।
हाई-टेक टोलिंग की ओर भारत
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने देश में टोल वसूली का नक्शा बदलने की तैयारी कर ली है। मौजूदा फिजिकल टोल प्लाजा को हटाकर 'मल्टी-लेन फ्री-फ्लो' तकनीक और ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरे लगाए जाएंगे। इससे गाड़ियों को टोल पर रुकने की जरूरत नहीं पड़ेगी और ट्रैफिक बिना किसी रुकावट के चलता रहेगा।
क्यों है यह बदलाव जरूरी?
वर्तमान में, सरकार का टोल कलेक्शन पर खर्च 12% से 15% के बीच है। नई डिजिटल प्रणाली से यह खर्च घटकर महज 2% से 4% पर आ जाएगा। इस बचत और चोरी को रोकने से सरकारी राजस्व में ₹20,000 करोड़ से ₹25,000 करोड़ सालाना का इजाफा होगा। यह कदम न केवल सरकारी खजाने को भरेगा, बल्कि लॉजिस्टिक्स में लगने वाले उस समय और ईंधन को भी बचाएगा जो टोल प्लाजा पर लंबी कतारों के कारण बर्बाद होता है।
चुनौतियां और जोखिम
निवेशकों को इस प्रोजेक्ट के ऑपरेशनल रिस्क पर नजर रखनी चाहिए। फिजिकल सिस्टम से पूरी तरह सेंसर-आधारित नेटवर्क पर शिफ्ट होना आसान नहीं है। खराब मौसम या डैमेज नंबर प्लेट की स्थिति में तकनीक की सटीकता एक बड़ी चुनौती हो सकती है। सरकार ने अनपेड पास के लिए 72 घंटे का पेमेंट विंडो भी रखा है, लेकिन पूरी तरह सफलता तभी मिलेगी जब इसका कानूनी और रेगुलेटरी ढांचा बेहद मजबूत हो।
आगे का रोडमैप
सरकार का लक्ष्य है कि साल 2026 के अंत तक 60% से 70% टोल प्लाजा इस नई तकनीक में बदल जाएं। अब निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मॉनिटरेबल फैक्टर सिस्टम का 'अपटाइम' और ट्रैफिक हैंडलिंग की क्षमता होगी।
