भारत अब अपना खुद का सिविलियन एयरक्राफ्ट बनाने की तैयारी में है। सरकार इसे एक जॉइंट वेंचर के जरिए अगले 2 साल में हकीकत में बदलना चाहती है, ताकि **$100 बिलियन** के विशाल ऑर्डर बैकलॉग का लाभ उठाया जा सके।
बड़े बदलाव की तैयारी
सिविल एविएशन मिनिस्टर के. राममोहन नायडू ने ऐलान किया है कि भारत अगले 2 साल के भीतर अपना पहला इंडीजीनस (स्वदेशी) सिविलियन एयरक्राफ्ट तैयार कर लेगा। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को एक स्ट्रेटेजिक जॉइंट वेंचर के जरिए पूरा किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य अब सिर्फ पुर्जे बनाने तक सीमित न रहकर खुद के विमान बनाना है, जिससे वैश्विक दिग्गजों पर निर्भरता कम हो सके।
क्यों है यह बड़ा मौका?
भारत का एविएशन मार्केट तेजी से बढ़ रहा है। अभी भारतीय एयरलाइंस के पास 1,600 से ज्यादा नए विमानों के ऑर्डर पेंडिंग हैं, जिनकी वैल्यू करीब $100 बिलियन है। देश में अभी करीब 850 विमान ऑपरेट कर रहे हैं और अगले 10 साल में 100 नए एयरपोर्ट्स बनाने की योजना है, जिससे स्थानीय स्तर पर बने विमानों की भारी मांग पैदा होगी।
मौजूदा स्थिति और आधार
भारत पहले से ही ग्लोबल एयरोस्पेस सप्लाई चेन का हिस्सा है। Boeing और Airbus जैसी कंपनियां भारत से हर साल करीब $4 बिलियन के कंपोनेंट और सर्विस लेती हैं। सरकार का लक्ष्य 2030 तक इसे $10 बिलियन तक ले जाने का है, जो इस नए प्रोजेक्ट के लिए एक मजबूत नींव का काम करेगा।
इन चुनौतियों पर रखें नज़र
पार्ट्स बनाने से लेकर पूरा विमान असेंबल करना एक बेहद जटिल काम है। इसमें जेट इंजन जैसे हाई-प्रिसिजन पार्ट्स की इंजीनियरिंग शामिल है, जिससे देरी या बजट बिगड़ने का रिस्क रहता है। साथ ही, अभी तक किसी पार्टनर का नाम फाइनल नहीं हुआ है, जिससे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और टाइमलाइन पर अनिश्चितता बनी हुई है।
इसके अलावा, एविएशन सेक्टर पर फ्यूल की बढ़ती कीमतों का भारी दबाव है। वेस्ट एशिया में चल रहे तनाव के कारण ईंधन की कीमतों में अस्थिरता है, जो एयरलाइंस के मार्जिन को प्रभावित कर रही है। आने वाले समय में निवेशकों के लिए जॉइंट वेंचर पार्टनर का ऐलान और विमान का डिजाइन ही सबसे महत्वपूर्ण अपडेट होंगे।
