सड़क परिवहन मंत्रालय फरवरी तक मल्टी-लेन फ्री फ्लो (MLFF) टोलिंग सिस्टम लागू करने की योजना बना रहा है। इस डिजिटल पहल का मकसद टोल प्लाजा पर वाहनों का रुकना खत्म करना है, जिससे लॉजिस्टिक्स और फ्यूल की भारी बचत हो सकेगी।
तकनीक कैसे करेगी काम?
यह नई व्यवस्था सिर्फ FASTag पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि इसमें FASTag, ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरे और AI-बेस्ड एनालिटिक्स का इस्तेमाल किया जाएगा। फिलहाल FASTag लेन में भी गाड़ियों को रफ्तार धीमी करनी पड़ती है, लेकिन नई व्यवस्था में सड़क पर लगे सेंसर और कैमरे चलती गाड़ी की पहचान कर सीधे लिंक अकाउंट से टोल काट लेंगे।
लॉजिस्टिक्स में आएगी तेजी
सरकार का मुख्य जोर सप्लाई चेन की एफिशिएंसी बढ़ाने पर है। टोल प्लाजा पर फिजिकल बैरियर हटने से फ्यूल की बर्बादी कम होगी और कमर्शियल ट्रांसपोर्ट का टर्नअराउंड टाइम काफी घट जाएगा।
चुनौतियां और जोखिम (Operational Risks)
इस बड़े बदलाव के साथ कुछ तकनीकी जोखिम भी हैं, जिन पर मार्केट की नजर है:
- तकनीकी सटीकता: तेज रफ्तार पर ANPR कैमरों द्वारा नंबर प्लेट पढ़ने में गलती होने से बिलिंग में गड़बड़ी या रेवेन्यू लीकेज का खतरा हो सकता है।
- कैपिटल एक्सपेंडिचर: मौजूदा टोल प्लाजा को अपग्रेड कर वहां गैंट्री और सेंसर लगाने की प्रक्रिया काफी महंगी है।
- डेटा प्राइवेसी: लाखों वाहनों के मूवमेंट डेटा की सुरक्षा एक बड़ा सवाल बनी हुई है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
फिलहाल इसके पायलट प्रोजेक्ट NH-48 और NH-44 जैसे रूट पर चल रहे हैं, जिसमें Jio Payments Bank जैसी संस्थाएं भी जुड़ी रही हैं। भविष्य में सिस्टम की स्टेबिलिटी, बिलिंग की सटीकता और डिस्प्यूट मैनेजमेंट ही इस प्रोजेक्ट की सफलता और हाईवे नेटवर्क की फाइनेंशियल वायबिलिटी तय करेंगे।
