भारत सरकार ने अगले एक दशक में **51,000 किमी** लंबे हाई-स्पीड रोड कॉरिडोर बनाने की योजना तैयार की है। इस बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर पुश का मकसद लॉजिस्टिक्स खर्च को घटाकर **10%** से कम करना और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को रफ्तार देना है।
भारत सरकार ने देश के लॉजिस्टिक्स सेक्टर की कायापलट करने के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप तैयार किया है। अगले 10 साल में 51,000 किमी के एक्सेस-कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे का जाल बिछाया जाएगा। इसका सीधा असर माल ढुलाई की रफ्तार और लागत पर पड़ेगा, जो फिलहाल मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव
सरकार पुराने हाईवे नेटवर्क को अपग्रेड करने पर लगातार काम कर रही है। 2018-19 में नेशनल हाईवे पर 25% सड़कें दो लेन से कम की थीं, जो अब घटकर केवल 8% रह गई हैं। अब जोर केवल लंबाई बढ़ाने पर नहीं, बल्कि सड़कों की क्षमता (Throughput Capacity) सुधारने पर है।
प्रोडक्टिविटी का अंतर
भारत में एक ट्रक औसतन 300-350 किमी प्रतिदिन की दूरी तय करता है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 700-800 किमी और चीन में 550-650 किमी है। पुरानी सड़कों और लोकल ट्रैफिक के कारण होने वाली देरी को खत्म करने के लिए अहमदाबाद-वडोदरा जैसे एक्सप्रेसवे का मॉडल पूरे देश में लागू किया जाएगा।
मल्टी-मोडल रणनीति
सड़कों के साथ-साथ सरकार हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर पर भी बड़ा दांव लगा रही है। 2026-27 के बजट में 7 नए हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट्स के लिए ₹16 लाख करोड़ का भारी-भरकम आउटले तय किया गया है। इसका उद्देश्य देश की लॉजिस्टिक्स लागत को सिंगल डिजिट में लाना है।
रिस्क और चुनौतियां
इतने बड़े प्रोजेक्ट्स की राह में जमीन अधिग्रहण (Land Acquisition) जैसी समस्याएं हमेशा बनी रहती हैं, जिससे देरी और लागत बढ़ने का रिस्क रहता है। इसके अलावा, फंडिंग के लिए सरकार निजी क्षेत्र के साथ BOT (Build-Operate-Transfer) और HAM (Hybrid Annuity Model) जैसे मॉडल्स पर निर्भर है, जिसके लिए निवेशकों का भरोसा बनाए रखना अनिवार्य होगा।
