भारतीय सरकार ने अगले **5** सालों में अपने नेशनल फ्लीट में **100** नए मर्चेंट वेसल्स (Merchant Vessels) को शामिल करने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। इसका मुख्य मकसद विदेशी शिपिंग कंपनियों पर निर्भरता कम करना और **$75 अरब** के सालाना फ्रेट बिल में कटौती करना है।
विदेशी निर्भरता कम करने की तैयारी
भारत का समुद्री व्यापार अब एक बड़े बदलाव की ओर है। फिलहाल भारत अपने एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के लिए विदेशी शिपिंग लाइन्स को सालाना $75 अरब का भुगतान करता है। इस भारी-भरकम विदेशी मुद्रा के आउटफ्लो को रोकने के लिए सरकार अपने मौजूदा 1,600 जहाजों के बेड़े में 100 नए मर्चेंट जहाज जोड़ने जा रही है। यह कदम 'Maritime India Vision 2030' और 'Maritime Amrit Kaal Vision 2047' का अहम हिस्सा है। इसके अलावा, ₹10,000 करोड़ की 'कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग असिस्टेंस स्कीम' के जरिए घरेलू सप्लाई चेन को भी मजबूत किया जा रहा है।
असली चुनौती: कॉस्ट डिसएडवांटेज
भले ही योजना बड़े पैमाने पर है, लेकिन घरेलू ऑपरेटर्स के लिए रास्ता आसान नहीं है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारतीय झंडे वाले जहाजों को ऑपरेट करने की लागत 16% से 20% ज्यादा है। इसकी मुख्य वजहें फाइनेंसिंग पर ज्यादा ब्याज दर, शिप इंपोर्ट पर लगने वाले टैक्स और नाविकों के वेतन पर इनकम टैक्स लेवी है।
आगे की राह
फिलहाल 'Right of First Refusal' के जरिए सरकारी कार्गो में घरेलू जहाजों को प्राथमिकता दी जा रही है, लेकिन ग्लोबल मार्केट में टिकने के लिए स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स जरूरी हैं। नेशनल शिपिंग बोर्ड ने 5 पिलर्स वाला रोडमैप तैयार किया है, जिसमें फिस्कल सपोर्ट और रेगुलेटरी रिफॉर्म्स पर जोर दिया गया है। निवेशकों के लिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार कब तक ऑपरेशनल लागत कम करने के लिए कड़े नीतिगत फैसले लेती है ताकि भारतीय जहाज बिना सरकारी मदद के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबले के योग्य बन सकें।
