भारत सरकार ने साल 2030 तक एयर कार्गो की क्षमता को बढ़ाकर 10 मिलियन मीट्रिक टन करने का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, FedEx ने दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 150 मिलियन डॉलर का नया इंटीग्रेटेड हब खोला है। इसका मकसद ट्रांशिपमेंट (माल को एक हब से दूसरे हब ले जाना) की प्रक्रिया को बेहतर बनाना और ट्रांज़िट टाइम को कम करके भारत को ग्लोबल लॉजिस्टिक्स में मजबूत स्थिति में लाना है।
लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा विस्तार
भारत साल 2030 तक 10 मिलियन मीट्रिक टन एयर कार्गो पहुंचाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर काम कर रहा है। फिलहाल, देश की एयर कार्गो हैंडलिंग क्षमता करीब 3.96 मिलियन टन है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय इस लक्ष्य को हासिल करके भारत को एक वैश्विक एयर फ्रेट हब बनाने की योजना पर जोर दे रहा है। इसी कड़ी में, FedEx कॉर्पोरेशन ने दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 150 मिलियन डॉलर का एक बड़ा इंटीग्रेटेड एयर कार्गो हब लॉन्च किया है, जिसका संचालन GMR ग्रुप करता है।
यह नया FedEx फैसिलिटी करीब 230,000 वर्ग फुट में फैला है और ऑपरेशनल एफिशिएंसी को काफी बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। पूरी तरह चालू होने पर, यह हब प्रति घंटे 600 से 5,000 पैकेज प्रोसेस करने की क्षमता रखेगा। निवेशकों और इंडस्ट्री के जानकारों के लिए, यह डेडिकेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर एक बड़ा कदम है, जो भारी मात्रा में सामान और जटिल सप्लाई चेन की जरूरतों को पूरा करने के लिए ज़रूरी है।
ट्रांशिपमेंट पर फोकस
सरकार ट्रांशिपमेंट की संभावनाओं को भुनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। ट्रांशिपमेंट में सामान को अंतिम गंतव्य तक पहुंचने से पहले एक मध्यवर्ती हब से गुजारा जाता है। फिलहाल, भारत का ट्रांशिपमेंट शेयर 5% से भी कम है, जो सिंगापुर और हांगकांग जैसे अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स हब से काफी पीछे है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, इस शेयर को 20% तक ले जाने से 5 अरब डॉलर तक का रेवेन्यू मिल सकता है। इस सुविधा के लिए, मंत्रालय ने सिक्योरिटी प्रोटोकॉल में बदलाव किए हैं, जिससे कुछ रूट्स पर री-स्क्रीनिंग की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। चेन्नई-दिल्ली-फ्रैंकफर्ट रूट पर हुए सफल ट्रायल से ट्रांज़िट टाइम लगभग 60 घंटे से घटकर करीब 17 घंटे रह गया है, जो इन नीतिगत बदलावों का असर दिखाता है।
सेक्टर की चुनौतियां और भविष्य
लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार तो सकारात्मक है, लेकिन इस सेक्टर को कुछ खास चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। भारत की वर्तमान एयर कार्गो क्षमता का लगभग 70% 'बेली-होल्ड' कार्गो पर निर्भर करता है, यानी पैसेंजर प्लेन में उपलब्ध जगह। इससे फ्लेक्सिबिलिटी कम हो जाती है, क्योंकि कार्गो क्षमता पैसेंजर फ्लाइट शेड्यूल से बंधी होती है, न कि कार्गो की मांग से।
एक और चुनौती कंसंट्रेशन रिस्क की है। फिलहाल, भारत के टॉप 10 एयरपोर्ट्स कुल एयर कार्गो ट्रैफिक का करीब 94% संभालते हैं। छोटे शहरों तक पहुंच बढ़ाने के लिए लगातार निवेश और एयरलाइंस, एयरपोर्ट ऑपरेटर्स और लॉजिस्टिक्स फर्मों के बीच बेहतर तालमेल की ज़रूरत होगी। इसके अलावा, डेडिकेटेड कार्गो एयरलाइंस को रेगुलेटरी जटिलताओं, जैसे हाई क्रू कॉस्ट और फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन्स (FDDTL) का सामना करना पड़ता है, जो ऑपरेशनल प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित कर सकता है।
सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए, ऑफ-एयरपोर्ट लोकेशन पर एयर फ्रेट स्टेशन्स (AFS) की स्थापना और डिजिटल कस्टम्स मॉडर्नाइजेशन की सफलता जैसे प्रमुख विकास पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इंफ्रास्ट्रक्चर 2030 के वॉल्यूम लक्ष्यों के साथ तालमेल बिठा पाता है या नहीं, बिना अत्यधिक लागत या कर्ज के दबाव के।
