शिपिंग चार्जेज़ पर रेगुलेटरी एक्शन
सरकारी सूत्रों के अनुसार, शिपिंग लाइन्स और पोर्ट ऑपरेटर्स को अब अपने सभी छिपे हुए और अतिरिक्त शुल्कों का खुलासा करना होगा। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (Directorate General of Shipping) मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 2025 (Merchant Shipping Act, 2025) के तहत इस बारे में जल्द ही गाइडलाइंस जारी करेगा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बुकिंग के समय जो भी बिल ऑफ लैडिंग (Bill of Lading) में तय हुआ है, उसके अलावा कोई भी अतिरिक्त शुल्क न लिया जाए। सरकार का मानना है कि कुछ कंपनियां इस समय का फायदा उठाकर मनमाने ढंग से शुल्क वसूल रही हैं। सेक्शन 317 के तहत सरकार को ऐसे मामलों में दखल देने का अधिकार है, ताकि एक्सपोर्टर्स को अनुचित लागत से बचाया जा सके।
एक्सपोर्टर्स और शिपिंग कंपनियों के बीच तकरार
एक्सपोर्टर्स ने आरोप लगाया है कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के साथ ही लॉजिस्टिक्स की लागतें बेतहाशा बढ़ी हैं। कई बार तो बिना किसी पूर्व सूचना के सरचार्जेज़ (Surcharges) लगा दिए जाते हैं, जिससे शिपमेंट का कुल खर्च काफी बढ़ जाता है। मिसाल के तौर पर, जेएनपीटी (JNPT) से दुबई तक के रूट पर 20-फुट कंटेनर पर सरचार्ज ही लगभग $2,000 तक पहुँच गया है, जो बेस रेट से करीब 250% ज्यादा है। कुछ एक्सपोर्टर्स का तो यह भी कहना है कि यह सरचार्ज उन कार्गो पर भी लगाया जा रहा है जो 28 फरवरी, 2026 को तनाव बढ़ने से पहले ही मध्य पूर्व के बंदरगाहों पर पहुँच चुके थे।
दूसरी ओर, कंटेनर शिपिंग लाइन्स एसोसिएशन (CSLA) और इंडियन नेशनल शिपओनर्स एसोसिएशन (INSA) जैसी इंडस्ट्री बॉडीज का कहना है कि शिपिंग कंपनियाँ मुनाफाखोरी नहीं कर रही हैं, बल्कि खुद बढ़ी हुई लागतों का सामना कर रही हैं। उनके मुताबिक, पिछले कुछ सालों में फ्रेट रेट्स (Freight Rates) ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गए थे। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों में आई रुकावटों के कारण ग्लोबल समुद्री माल ढुलाई दरें (Maritime Freight Rates) तीन गुना तक बढ़ सकती हैं। शिपिंग कंपनियों के लिए उच्च बीमा प्रीमियम (Higher Insurance Premiums), रूट बदलना और देरी जैसे कारण लागत बढ़ा रहे हैं।
मार्केट का रिएक्शन और सेक्टर पर असर
इन सब के बावजूद, भारतीय शिपिंग स्टॉक्स में मजबूती बनी हुई है। शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) करीब ₹241.40 पर ट्रेड कर रहा है, जिसका मार्केट कैप लगभग ₹11,200 करोड़ और पी/ई रेशियो (P/E Ratio) 10.34 के आसपास है। MarketsMojo ने इसे 'Buy' रेटिंग दी है। वहीं, ग्रेट ईस्टर्न शिपिंग कंपनी (GES) लगभग ₹1,300-1,360 के भाव पर कारोबार कर रही है। इसका मार्केट कैप करीब ₹20,000 करोड़ है और पी/ई रेशियो 8.77 से 8.92 के बीच है (मार्च 2026 की शुरुआत तक)। विश्लेषकों ने GES को 'Strong Buy' रेटिंग दी है। भारत का लॉजिस्टिक्स सेक्टर, जिसके 2026 तक 10.7% सीएजीआर (CAGR) से बढ़ने की उम्मीद है, इन व्यवधानों से सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है। युद्ध जोखिम प्रीमियम (War Risk Premiums) और तेल की कीमतों में अस्थिरता ने शिपिंग ऑपरेशंस की लागत बढ़ा दी है। प्रमुख शिपिंग लाइन्स जैसे Maersk ने पहले ही कुछ रूट्स पर बुकिंग सस्पेंड कर दी है।
आगे की राह: पारदर्शिता और चुनौतियाँ
सरकार की इस पहल से एक्सपोर्टर्स को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव अगर बना रहता है, तो शिपिंग लाइन्स के लिए परिचालन लागतें (Operational Costs) ऊंची बनी रहेंगी। ईंधन की बढ़ती कीमतें, बीमा का महंगा होना और लंबे रूट के कारण लगने वाला अतिरिक्त समय, कंपनियों पर वित्तीय दबाव बनाए रखेगा। मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 2025 के उल्लंघन पर ₹5 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान भी है, जो नियमों के सख्त अनुपालन का संकेत देता है। आने वाले महीने यह तय करेंगे कि पारदर्शिता के नए नियम इन चुनौतियों का सामना करने में कितने प्रभावी साबित होते हैं।