भारत की सड़कें: **60%** प्रोजेक्ट अटके, पर डेवलपर्स की सेहत ठीक! Crisil का खुलासा

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारत की सड़कें: **60%** प्रोजेक्ट अटके, पर डेवलपर्स की सेहत ठीक! Crisil का खुलासा
Overview

Crisil Ratings की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM) के तहत चल रहे **60%** से ज़्यादा रोड प्रोजेक्ट्स में औसतन **11 महीने** की देरी चल रही है।

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रोड प्रोजेक्ट्स में लग रहा लंबा जाम

भारत में हाईवे कंस्ट्रक्शन, खासकर हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM) प्रोजेक्ट्स को लेकर बड़ी मुश्किलें सामने आ रही हैं। Crisil Ratings ने 72 चालू HAM प्रोजेक्ट्स (लगभग 2,600 किमी के) का एनालिसिस किया, जिसमें पाया गया कि लगभग 60% प्रोजेक्ट्स में औसतन 11 महीने की देरी हो रही है। इन देरी की वजह से नेशनल हाईवे डेवलपमेंट की रफ़्तार धीमी पड़ गई है।

75% देरी का मुख्य कारण 'राइट-ऑफ-वे' (RoW) यानी जमीन का पज़ेशन न मिलना है, जो कंस्ट्रक्शन के लिए बेहद ज़रूरी है। इसके अलावा, एनवायरनमेंट और फॉरेस्ट क्लीयरेंस में देरी, लोकल परमिट मिलने में दिक्कत, ज़मीनी स्तर पर विरोध प्रदर्शन और भारी बारिश जैसे मौसम की मार भी देरी के लिए जिम्मेदार हैं।

डेवलपर्स की क्रेडिट क्वालिटी बनी हुई है मजबूत

इन तमाम देरी के बावजूद, रोड डेवलपर्स की क्रेडिट क्वालिटी (credit quality) स्थिर बनी हुई है। Crisil के अनुसार, देरी से चल रहे प्रोजेक्ट्स में से 90% के लिए एक्सटेंशन (extension) अप्रूव हो चुके हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देरी के जो कारण सामने आ रहे हैं, वे डेवलपर्स की गलती नहीं हैं। 54% HAM रोड लेंथ के लिए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) जैसे निकायों से एक्सटेंशन अप्रूवल मिल चुका है, जबकि 5% अभी पेंडिंग हैं। केवल 41% प्रोजेक्ट्स ही तय समय पर चल रहे हैं।

कॉस्ट ओवररन (Cost Overrun) का भी तोड़

कंस्ट्रक्शन की समय-सीमा बढ़ने से इन प्रोजेक्ट्स की लागत में औसतन 5-10% की महंगाई आई है, जिससे डेवलपर्स के लिए कॉस्ट ओवररन का खतरा बढ़ गया है। हालांकि, कॉन्ट्रैक्ट में मौजूद सेफगार्ड्स (safeguards) इस वित्तीय दबाव को काफी हद तक कम कर रहे हैं। कंसेशन एग्रीमेंट (concession agreement) में इंफ्लेशन-लिंक्ड इंडेक्सेशन (inflation-linked indexation) क्लॉज़ डेवलपर्स को बढ़ी हुई लागत की भरपाई करने की इजाजत देते हैं। जहाँ RoW उपलब्ध नहीं है, वहां प्रोजेक्ट के कुछ हिस्सों को डी-स्कोप (de-scope) करना या डी-लिंक (de-link) जैसे कदम भी डेवलपर के कैश फ्लो की सुरक्षा करते हैं। इन तंत्रों से देरी के बावजूद प्रोजेक्ट्स को प्रोविज़नल कंप्लीशन सर्टिफिकेट (provisional completion certificate) मिल जाता है।

ऑपरेशनल (operational) HAM प्रोजेक्ट्स पर भी एग्जीक्यूशन (execution) में देरी का असर दिख रहा है। Crisil ने पाया कि मार्च 2026 तक ऑपरेशनल होने वाले HAM रोड लेंथ का लगभग 58% हिस्सा औसतन 9.5 महीने की देरी से चल रहा है। अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स की तरह, इनमें से भी ज़्यादातर को एक्सटेंशन अप्रूवल मिल गए हैं, जिससे रेटिंग पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.