भारत ने ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के साथ तालमेल बिठाने के लिए 'Protection of Interests in Aircraft Objects Act' लागू कर दिया है। इसका सीधा मकसद एयरक्राफ्ट लीज रेंटल्स (lease rentals) को घटाना और फाइनेंशियर्स के लिए एसेट रिकवरी को आसान बनाना है।
कानून का असर और एसेट रिकवरी
लंबे समय से विदेशी लीजर्स भारत के बाजार को लेकर सतर्क थे, क्योंकि एयरलाइंस के दिवालिया होने की स्थिति में विमान वापस पाना एक बड़ी चुनौती थी। अब 2025 का नया एक्ट भारत को 'Cape Town Convention' के मानकों के बराबर ले आता है। इसके तहत 5 दिन की डी-रजिस्ट्रेशन विंडो दी गई है, जिससे डिफ़ॉल्ट होने पर लीजर्स आसानी से अपना एसेट रिकवर कर पाएंगे। इसका नतीजा यह है कि Aviation Working Group ने भारत की कंप्लायंस रेटिंग में सुधार किया है, जो विदेशी निवेशकों के बढ़ते भरोसे का संकेत है।
GIFT IFSC: नया फाइनेंस हब
सरकार अब गुजरात स्थित GIFT IFSC को एविएशन फाइनेंस का मुख्य केंद्र बनाना चाहती है। टैक्स हॉलिडे और फॉरेन करेंसी ट्रांजेक्शन की सुविधा के जरिए, यह आयरलैंड और सिंगापुर जैसे ग्लोबल हब को टक्कर देने की तैयारी में है। इससे डोमेस्टिक एयरलाइंस को विदेश पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे लॉन्ग टर्म में कैपिटल कॉस्ट कम होने की उम्मीद है।
एयरलाइंस के लिए राहत के अन्य कदम
सिर्फ लीजिंग ही नहीं, सरकार ने ऑपरेटिंग कॉस्ट कम करने पर भी ध्यान दिया है। अगस्त 2026 में ATF (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) के लिए 'प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड' को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा, यूनियन बजट 2026-27 में एयरक्राफ्ट पार्ट्स और MRO सर्विसेज के लिए कस्टम ड्यूटी में छूट दी गई है, जिससे एयरलाइंस का खर्चा कम होगा।
निवेशकों के लिए सावधानी
हालांकि यह बदलाव स्वागत योग्य हैं, लेकिन इनकी सफलता न्यायिक दक्षता पर निर्भर करेगी। निवेशकों को याद रखना चाहिए कि भारतीय एविएशन सेक्टर अभी भी हाई-रिस्क जोन में है, जहां लगभग 80% बेड़ा लीज पर चलता है। फ्यूल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और ग्लोबल जियोपॉलिटिकल तनाव अभी भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये रिफॉर्म्स वाकई में लीज रेंटल को नीचे लाने में सफल होते हैं या नहीं।
