भारत सरकार अब अपने समुद्री सेक्टर को मिथेनॉल (Methanol) की ओर शिफ्ट करने की तैयारी में है। इसका उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन को कम करना और आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाना है, जिससे पोर्ट और शिपिंग कंपनियों के लिए नए अवसर खुल सकते हैं।
पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े बदलाव की तैयारी
मिथेनॉल को मुख्य ईंधन बनाने के लिए बंदरगाहों पर बड़े स्तर पर बदलाव की जरूरत होगी। पोर्ट ऑपरेटर्स को अब स्टोरेज टैंक और रिफ्यूलिंग के लिए स्पेशलाइज्ड इक्विपमेंट में भारी निवेश करना पड़ सकता है। सरकार पोर्ट चार्जेस और फ्यूल प्राइसिंग को स्टैंडर्डाइज करने पर विचार कर रही है, जिसका सीधा असर Adani Ports and Special Economic Zone और Gujarat Pipavav Port जैसी कंपनियों पर पड़ सकता है। सरकार की योजना है कि जो पोर्ट्स पहले मिथेनॉल सुविधा अपनाएंगे, वहां जहाजों की टर्नअराउंड स्पीड बढ़ाई जाए ताकि अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लाइन्स को आकर्षित किया जा सके।
घरेलू उत्पादन और नई सप्लाई चेन
इस नीति का सबसे दिलचस्प पहलू 'स्वदेशी' मिथेनॉल पर फोकस है। सरकार कृषि अवशेषों (agricultural residue) से बायो-मिथेनॉल बनाने की संभावनाएं तलाश रही है। अगर यह तकनीक सफल होती है, तो Deepak Fertilisers जैसी केमिकल और फर्टिलाइजर कंपनियों के लिए नए कारोबार के दरवाजे खुल सकते हैं, हालांकि इसकी सफलता उत्पादन की स्केलेबिलिटी पर निर्भर करेगी।
रिस्क और निवेशकों के लिए वॉचलिस्ट
हालांकि यह ग्रीन इनिशिएटिव अच्छा है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी समस्या पुराने शिप इंजनों को मिथेनॉल के अनुकूल बनाने (Retrofitting) की लागत है। Shipping Corporation of India जैसी कंपनियों को अपनी फ्लीट अपग्रेड करने के भारी खर्च और पर्यावरण संबंधी लाभों के बीच संतुलन बनाना होगा। साथ ही, अगर मिथेनॉल पारंपरिक ईंधन के मुकाबले महंगा रहा, तो इसे अपनाने की रफ्तार धीमी हो सकती है। निवेशकों को सरकार के आने वाले टेंडर्स और पोर्ट कंपनियों के मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए।
