भारत का मेट्रो रेल नेटवर्क तेजी से बढ़कर **1,170 किलोमीटर** तक पहुंच गया है। अगले दो वर्षों में हम अमेरिका के **1,386 किलोमीटर** के नेटवर्क को पीछे छोड़ देंगे, जो इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है।
भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर अब वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान बनाने की ओर अग्रसर है। साल 2014 में महज 248 किलोमीटर में फैली मेट्रो अब 26 शहरों में 1,170 किलोमीटर का सफर तय कर चुकी है। इस गति से साफ है कि आने वाले 2 वर्षों में भारत अमेरिका के 1,386 किलोमीटर के विशाल नेटवर्क को पीछे छोड़ देगा।
सरकार का विजन और बड़ा निवेश
हाल ही में शुरू हुए इंदौर मेट्रो एक्सटेंशन जैसे प्रोजेक्ट सरकार के 'विकसित भारत' विजन का हिस्सा हैं। इसके अलावा, ₹18,500 करोड़ की लागत वाली इंदौर-मनमाड रेलवे लाइन जैसी परियोजनाएं मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में लॉजिस्टिक्स को और मजबूत करेंगी।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
इस विस्तार से सिविल कंस्ट्रक्शन, सिग्नलिंग, रोलिंग स्टॉक और इंजीनियरिंग क्षेत्र की कंपनियों के ऑर्डर बुक में भारी उछाल आने की उम्मीद है। हालांकि, निवेशकों को कुछ बातों पर नजर रखनी चाहिए:
- कैपिटल इंटेंसिव: ये प्रोजेक्ट सरकारी बजट पर निर्भर हैं, इसलिए सरकारी नीतियों में बदलाव का असर कंपनियों पर पड़ सकता है।
- एग्जीक्यूशन रिस्क: लैंड एक्विजिशन (Land acquisition) और घनी आबादी वाले इलाकों में निर्माण कार्य में देरी प्रोजेक्ट की लागत बढ़ा सकती है।
फिलहाल, देश भर में करीब 1,000 किलोमीटर लंबी मेट्रो लाइन पर काम जारी है। मार्केट के जानकारों का मानना है कि इन कंपनियों का रेवेन्यू सीधे तौर पर सरकार द्वारा नई टेंडरिंग और प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने की गति पर निर्भर करेगा।
