संकट का सबब: खतरे में व्यापार की जीवनरेखा
मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ी सीधी सैन्य कार्रवाई ने वैश्विक सप्लाई चेन (supply chains) को झकझोर कर रख दिया है। खासकर, हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जो दुनिया के लगभग 20% तेल और 20% एलएनजी (LNG) का रास्ता है, अब वाणिज्यिक जहाजों के लिए बंद सा हो गया है। इस वजह से माल ढुलाई की लागत (freight rates) में भारी उछाल आया है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, समुद्री माल ढुलाई 20% से 30% तक महंगी हो सकती है, वहीं एयर कार्गो (air cargo) की दरें तो मात्र 48 घंटे में 400% तक बढ़ गई हैं।
भारत पर सीधा असर: देरी और महंगाई की मार
दुनिया की प्रमुख शिपिंग लाइन्स जैसे MSC और Maersk ने बुकिंग रोक दी है और जहाजों का रूट बदल दिया है। अब जहाजों को केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) के रास्ते चक्कर लगाकर आना पड़ रहा है, जिसमें 15 से 20 दिन ज्यादा लग रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि भारत से होने वाले निर्यात, खासकर खराब होने वाले सामान (perishable cargoes) और दवाओं (pharmaceuticals) के पहुंचने में देरी होगी और लागत बढ़ेगी। Dr. Reddy's जैसी कुछ दवा कंपनियों ने स्टॉक की कमी की चेतावनी भी दी है। फेडरेशन ऑफ फ्रेट फॉरवर्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FFFAI) इस समस्या से निपटने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम कर रही है।
इकोनॉमी पर गहराता साया: कच्चा तेल, रुपया और महंगाई
यह संकट ऐसे समय में आया है जब वैश्विक व्यापार पहले से ही तनाव में था। भारत की बात करें तो, उसकी करीब आधी यानी 40-50% कच्चा तेल (crude oil) की जरूरत, जो हर दिन 15 से 20 लाख बैरल होती है, हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है। इस वजह से ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतें $77 प्रति बैरल तक पहुंच गईं और आशंका है कि यह $100 के पार भी जा सकती है। अगर तेल की यह कीमतें लंबे समय तक बनी रहीं, तो भारत के चालू खाते के घाटे (current account deficit) में 0.4% का इजाफा हो सकता है। साथ ही, महंगाई (inflationary pressures) को भी पंख लगेंगे। सोमवार को ही ईरान से जुड़ी खबरों के चलते भारतीय रुपया (Indian Rupee) कमजोर हुआ, जिससे आयात की लागत और बढ़ गई।
भू-राजनीतिक जोखिम और भारत की भेद्यता
यह स्थिति मध्य पूर्व में अस्थिरता के प्रति भारत की संरचनात्मक भेद्यता (structural vulnerability) को उजागर करती है। भारत अपनी एलएनजी (LNG) और एलपीजी (LPG) की बड़ी मात्रा भी इसी रास्ते से आयात करता है। ऐसे में, भारत न केवल कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव का सामना कर सकता है, बल्कि सप्लाई में रुकावट का भी खतरा है, जैसा कि 1970 के दशक के तेल संकट में देखा गया था। अच्छी बात यह है कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) मजबूत हैं, जो करीब एक साल के आयात के बराबर हैं। लेकिन, लगातार ऊंचे एनर्जी प्राइस और शिपिंग की बढ़ी लागत चालू खाते और महंगाई पर दबाव बना सकती है। जहाजों का लंबा चक्कर लगाना भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी चुनौती है, खासकर बासमती चावल, चाय और कृषि उत्पादों के लिए।
आगे क्या?**
विश्लेषकों का मानना है कि बाजार तनाव की अवधि और तीव्रता पर कड़ी नजर रखेगा, जिसका वैश्विक ऊर्जा कीमतों और व्यापार प्रवाह पर गहरा असर पड़ेगा। हालांकि, लंबे समय में भू-राजनीतिक घटनाओं का बाजार पर असर कम हो सकता है, लेकिन भारत के व्यापार और अर्थव्यवस्था पर इसका तत्काल प्रभाव काफी गंभीर है। इस स्थिति से निपटने के लिए सप्लाई चेन को और मजबूत करने और वैकल्पिक रास्तों की खोज पर जोर देना होगा।