सरकारी एजेंसियां अब ज्यादा सतर्क हो गई हैं। नए हाईवे प्रोजेक्ट्स देने से पहले वे ज़मीन की उपलब्धता और जरूरी सरकारी मंज़ूरियों (statutory clearances) को लेकर ज्यादा सुनिश्चित होना चाहती हैं।
इस सावधानी का मकसद ज़मीन अधिग्रहण (land acquisition), पर्यावरण मंजूरी (environmental approvals) और यूटिलिटी वर्क में होने वाली देरी से बचना है। अधिकारियों का कहना है कि देरी से प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ जाती है, इसलिए अब कुछ चुनिंदा और व्यवहार्य (viable) प्रोजेक्ट्स पर ही ध्यान दिया जा रहा है।
प्रोजेक्ट्स के फोकस में बड़ा बदलाव
इसके अलावा, मौजूदा हाईवेज़ को चौड़ा करने के बजाय, सरकार इकोनॉमिक कॉरिडोर्स और एक्सप्रेसवेज़ के विकास को प्राथमिकता दे रही है। फोकस अब बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के निर्माण पर है।
ठेकेदारों के बीच कॉम्पिटिशन और तेज
नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) और अन्य रोड एजेंसियों से नए प्रोजेक्ट्स की संख्या कम होने की वजह से कंस्ट्रक्शन फर्म्स के बीच कॉम्पिटिशन और बढ़ गया है। इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक, ठेकेदार काम हासिल करने के लिए शुरुआती अनुमानों (estimates) से 42% तक कम बोली लगा रहे हैं।
इंडस्ट्री के एग्जीक्यूटिव्स (executives) का मानना है कि इस सिकुड़ती प्रोजेक्ट पाइपलाइन का पूरा असर अगले दो सालों में दिखेगा, जिससे सेक्टर की एक्टिविटी और एग्जीक्यूशन (execution) पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, प्रोजेक्ट अवार्ड्स में ओवरऑल मंदी के बावजूद, NHAI ने अकेले 5,313 किमी नेशनल हाईवे का कंस्ट्रक्शन पूरा किया है, जो उसके 4,640 किमी के टारगेट से करीब 15% ज्यादा है।