भारत अब विदेशी जहाजों पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए Liberia और Panama के साथ समुद्री समझौते कर रहा है। सरकार के **₹69,725 करोड़** के मेगा प्लान के तहत घरेलू शिपबिल्डिंग और मैरीटाइम कैपेसिटी को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
भारत सरकार अपनी समुद्री अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए कमर कस चुकी है। लिबेरिया और पनामा, जो दुनिया की सबसे बड़ी ओपन शिप रजिस्ट्रियां हैं, उनके साथ रणनीतिक साझेदारी से प्रशासनिक देरी को कम करने और विदेशी जहाजों पर निर्भरता घटाने की योजना है। वर्तमान में, भारत का करीब 95% व्यापार विदेशी जहाजों के जरिए होता है, जिससे भू-राजनीतिक तनाव (जैसे रेड सी संकट) के समय आर्थिक जोखिम बढ़ जाते हैं।
बड़ा सरकारी निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर
यह कदम सरकार के ₹69,725 करोड़ के उस पैकेज का हिस्सा है, जिसे सितंबर 2025 में मंजूरी दी गई थी। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत:
- Maritime Development Fund: ₹25,000 करोड़ का फंड तैयार किया गया है।
- सब्सिडी स्कीम: घरेलू शिपबिल्डिंग को ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए ₹19,989 करोड़ की सब्सिडी दी जाएगी।
- लक्ष्य: आने वाले दशक में घरेलू शिपबिल्डिंग क्षमता को 4.5 मिलियन ग्रॉस टनेज सालाना तक पहुंचाना है।
जोखिम और भविष्य की राह
हालाँकि, ये समझौते एक बड़ी शुरुआत हैं, लेकिन भारतीय शिपयार्ड्स को ग्लोबल क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा करने में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। फिलहाल, वैश्विक शिपबिल्डिंग में भारत की हिस्सेदारी 1% से भी कम है। हालांकि, सरकार द्वारा 10,000 ग्रॉस टनेज और उससे अधिक के भारतीय कमर्शियल जहाजों को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा देने से इस सेक्टर में निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। निवेशकों के लिए अब शिपयार्ड्स की क्षमता और फंडिंग के बेहतर उपयोग पर नजर रखना जरूरी होगा।
