Ministry of Ports, Shipping and Waterways ने विदेशी जहाजों पर पाबंदी लगाने का फैसला वापस ले लिया है। 2018 की छूट को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया है, जिससे भारतीय शिपिंग कंपनियों को ग्लोबल प्लेयर्स के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा जारी रखनी होगी।
सरकार ने जनवरी और मार्च 2026 के अपने उन निर्देशों को पलट दिया है, जिनमें कोस्टल शिपिंग नियमों को कड़ा करने की योजना थी। सरकार के इस कदम का मतलब है कि विदेशी झंडे वाले जहाज भारतीय बंदरगाहों के बीच कार्गो और एक्सपोर्ट-इंपोर्ट कंटेनरों की ढुलाई जारी रख सकेंगे। मंत्रालय का कहना है कि ग्लोबल सप्लाई चेन को सुचारू रखने के लिए यह फैसला जरूरी था।
कंपनियों के लिए लागत की बड़ी चुनौती
इस फैसले से घरेलू शिपिंग कंपनियां फिलहाल बैकफुट पर हैं। दरअसल, भारतीय झंडे के तहत जहाज चलाना विदेशी झंडे की तुलना में 16% से 20% तक अधिक महंगा पड़ता है। इसकी मुख्य वजह ज्यादा टैक्स, मेंटेनेंस खर्च और डोमेस्टिक कैपिटल एक्सपेंस हैं। अब जब विदेशी जहाज कोस्टल ट्रेड में बने रहेंगे, तो घरेलू कंपनियों को अपनी प्राइसिंग को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए मुनाफे (Margins) के साथ समझौता करना पड़ सकता है।
$75 बिलियन का फ्रेट बिल और नई रणनीति
भारत को हर साल विदेशी शिपिंग कंपनियों को लगभग $75 बिलियन का फ्रेट (भाड़ा) चुकाना पड़ता है। इस भारी खर्च को कम करने के लिए सरकार ने अगले 5 सालों में मर्चेंट फ्लीट में 100 नए जहाज जोड़ने का रोडमैप तैयार किया है। हालांकि, यह योजना तभी सफल होगी जब सरकार घरेलू जहाजों की ऑपरेटिंग कॉस्ट कम करने के लिए टैक्स और लाइसेंसिंग ढांचे में बदलाव लाएगी। आने वाले समय में सरकार की ओर से फ्लीट विस्तार के लिए दिए जाने वाले इंसेंटिव्स पर निवेशकों की नजर रहनी चाहिए।
