India EV Goals: 2030 के लक्ष्य खतरे में? Funding Gap और High Interest Rates बन रही हैं सबसे बड़ी रुकावट

TRANSPORTATION
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
India EV Goals: 2030 के लक्ष्य खतरे में? Funding Gap और High Interest Rates बन रही हैं सबसे बड़ी रुकावट
Overview

भारत के इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर के लिए 2030 तक के लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं दिख रहा है। सामने ₹9.75 लाख करोड़ का भारी Funding Gap है, और ऊपर से Commercial कर्ज की दरें 15% से 33% तक हैं, जो इस सेक्टर की ग्रोथ को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं।

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भारत की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी (EV) को लेकर बड़ी योजनाएं हैं, खासकर 2-व्हीलर और 3-व्हीलर सेगमेंट में 2030 तक 80% तक इलेक्ट्रिफिकेशन का लक्ष्य है। हालांकि, इस सपने को हकीकत बनाने में बड़ी दिक्कतें आ रही हैं। 2020 से 2025 के बीच सेक्टर में करीब ₹2.11 लाख करोड़ का निवेश आया है, लेकिन यह 2030 के लिए जरूरी कुल ₹11.86 लाख करोड़ का महज़ 18% है। इसका मतलब है कि अभी भी ₹9.75 लाख करोड़ की भारी कमी है।

कैपिटल की कमी और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का हाल
बीते पांच सालों में जो पैसा आया, उसका सबसे बड़ा हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी में गया, उसके बाद सरकारी सब्सिडी और इंसेटिव्स का नंबर आता है। लेकिन, पब्लिक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बहुत पीछे है। अनुमानित ₹195 करोड़ की जरूरत में से केवल 9.6% ही चार्जिंग स्टेशन लगाने में लगे हैं। शुरुआत में 3-व्हीलर EV में ज्यादा पैसा लगा, क्योंकि वह ज्यादा मैच्योर थे, लेकिन अब फोकस 4-व्हीलर EV की तरफ बढ़ रहा है।

ब्याज दरों का पहाड़
Funding Gap से भी बड़ी समस्या है Commercial EV अपनाने वालों के लिए कैपिटल (पूंजी) की ऊंची लागत। आज के समय में Commercial Borrowers को 15% से 33% तक सालाना ब्याज दरें चुकानी पड़ रही हैं। यह ऊंची दरें EV के कुल खर्च (Total Cost of Ownership) के फायदे को खत्म कर देती हैं, जिससे मांग कम हो जाती है और बेड़े (fleet) का विस्तार रुक जाता है। इंडस्ट्री रिपोर्ट्स बताती हैं कि अगर क्रेडिट गारंटी या रिजिडुअल वैल्यू प्रोटेक्शन जैसे सिस्टमैटिक रिस्क-शेयरिंग मैकेनिज्म लाए जाएं, तो ब्याज दरें 8-12% तक आ सकती हैं, जो ज्यादा मैनेजेबल होंगी।

चार्जिंग स्टेशनों की कमी
पब्लिक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी एक बड़ी रुकावट है। गाड़ियों की बिक्री की रफ्तार से चार्जिंग स्टेशन नहीं लग पा रहे हैं। चार्जिंग स्टेशन लगाने में भारी शुरुआती खर्च और कम इस्तेमाल होने की वजह से निवेशकों का भरोसा भी कम है। इस कमी से 'रेंज एंग्जायटी' (गाड़ी की बैटरी खत्म होने का डर) बनी रहती है, खासकर पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में।

सरकारी नीतियों में बदलाव
सरकार अब सीधे सब्सिडी देने के बजाय मार्केट-बेस्ड ग्रोथ पर ज्यादा जोर दे रही है। FAME जैसी स्कीमें, जिन्होंने शुरू में 2-व्हीलर और 3-व्हीलर को बढ़ावा दिया था, अब धीरे-धीरे कम हो रही हैं। इसका मतलब है कि मार्केट को खुद खड़ा होना होगा।

दुनिया के मुकाबले पिछड़ रहे हम?
दुनिया के मुकाबले भारत की EV पेनिट्रेशन (बाजार हिस्सेदारी) काफी कम है। 2024 में नई कारों की बिक्री में EV की हिस्सेदारी सिर्फ 2-3% है, जबकि चीन में यह लगभग 65% है। भारत की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह EV बैटरी के लिए जरूरी मैटेरियल्स के लिए पूरी तरह चीन और पूर्वी एशियाई देशों पर निर्भर है। वहीं, लेंडर्स (कर्ज देने वाले) EV के बैटरी डिग्रेडेशन, रीसेल वैल्यू और कमर्शियल इस्तेमाल को लेकर अनिश्चित हैं, इसलिए वे ऊंचे ब्याज वसूल रहे हैं।

आगे की राह: फाइनेंसिंग में इनोवेशन जरूरी
तो क्या भारत अपने 2030 के EV लक्ष्य पूरे कर पाएगा? यह सिर्फ और पैसा लगाने से नहीं होगा, बल्कि वित्तीय सिस्टम में बड़े सुधारों से होगा। जब तक कैपिटल की लागत कम नहीं होगी और रिस्क-शेयरिंग के नए तरीके नहीं अपनाए जाएंगे, तब तक कमर्शियल EV का इस्तेमाल बढ़ना मुश्किल है। इंडस्ट्री को अब डायरेक्ट सब्सिडी से हटकर फाइनेंसिंग को आसान बनाने पर ध्यान देना होगा, ताकि असली EV क्रांति आ सके।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.