अंतर्राष्ट्रीय परिषद ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (ICCT) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत के राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) लक्ष्यों को पूरा करने से 2050 तक सड़क परिवहन से होने वाले CO2 उत्सर्जन में 50% की भारी कटौती हो सकती है। यह लक्ष्य भारत के 2070 तक नेट-जीरो के वादे को मजबूत करता है और अस्थिर जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) बाजारों पर निर्भरता को कम करता है।
भारत की सबसे बड़ी खासियत इसकी मजबूत घरेलू EV मैन्युफैक्चरिंग क्षमता है, जो देश की लगभग 80% EV बिक्री को पूरा करती है। यह स्थिति विकसित देशों के बराबर है और भारत को एक अनोखा आर्थिक लाभ देती है, जिससे घरेलू वैल्यू चेन और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलता है। हाल ही में जम्मू और कश्मीर में लिथियम भंडार की खोज ने घरेलू बैटरी उत्पादन क्षमता को और बढ़ाने की उम्मीदें जगाई हैं।
वैश्विक स्तर पर देखें तो, चीन जैसे देशों की तुलना में भारत में EV का इस्तेमाल अभी शुरुआती दौर में है। चीन दुनिया भर की EV बिक्री में 60% से अधिक का योगदान देता है और बैटरी उत्पादन में 80% क्षमता के साथ हावी है। भारत में कार EV का इस्तेमाल केवल 2% के आसपास है, जो चीन के 50% से काफी कम है।
हालांकि, भारत का ऑटोमोटिव सेक्टर पहले भी नीतिगत बदलावों से गुजरा है, जैसे 1990 के दशक का उदारीकरण जिसने विदेशी निवेश को आकर्षित किया। वर्तमान में, ऑटोमोटिव और एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएं, साथ ही भारत में इलेक्ट्रिक पैसेंजर कारों के निर्माण को बढ़ावा देने की योजना (SPMEPCI), निवेश आकर्षित करने और उत्पादन को स्थानीय बनाने पर केंद्रित हैं। ये नीतियां कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण घरेलू वैल्यू एडिशन (value addition) को अनिवार्य करती हैं, जिसके तहत लाभ प्राप्त करने के लिए 5 साल के भीतर 50% तक स्थानीयकरण (localization) हासिल करना होगा। भारी-भरकम वाहनों (heavy-duty vehicles) का विद्युतीकरण (electrification) भी भारत में उत्सर्जन कम करने का एक महत्वपूर्ण अगला मोर्चा माना जा रहा है।
चुनौतियां और जोखिम
हालांकि, भारत के EV लक्ष्य की राह में कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चिंता है नीति क्रियान्वयन (policy execution) और सप्लाई चेन (supply chain) की निर्भरता। देश अभी भी आयातित कंपोनेंट्स, खासकर चीन से आने वाले पार्ट्स पर काफी निर्भर है, जो गहरे स्थानीयकरण (deeper localization) के रास्ते में एक बड़ी बाधा है। चिंता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि भारत में बिकने वाले लगभग 13% EV मॉडल ही अपने उच्च आयातित कंटेंट के कारण PLI लाभ के लिए योग्य हैं।
चीन का बैटरी और सेमीकंडक्टर जैसे महत्वपूर्ण EV कंपोनेंट्स की वैश्विक आपूर्ति पर नियंत्रण भारत को कमजोर स्थिति में डालता है। आयात निर्भरता के अलावा, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, EVs की 20-30% अधिक शुरुआती लागत (आंतरिक दहन इंजन वाहनों की तुलना में), और नियामक अनिश्चितताएं (regulatory uncertainties) भी प्रमुख बाधाएं हैं। FAME II जैसी सरकारी सब्सिडी महत्वपूर्ण रही हैं, लेकिन उनके चरणबद्ध तरीके से हटने के बाद निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए स्थिर, दीर्घकालिक नीतिगत ढांचे की आवश्यकता होगी। अतीत में EV लक्ष्यों को पूरा करने में विफलताएं इस क्षेत्र की नीतिगत निरंतरता के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती हैं।
भविष्य की राह
यह अनुमान है कि राष्ट्रीय और राज्य नीतियों के प्रभावी होने के साथ 2030 के दशक में भारत में EV अपनाने की गति तेज होगी। सरकार का स्थानीयकरण पर जोर और लिथियम जैसे खनिजों की खोज एक आत्मनिर्भर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र (self-reliant manufacturing ecosystem) बनाने का लक्ष्य रखती है।
हालांकि, 2050 तक 50% उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य को साकार करने के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन, बुनियादी ढांचे की कमी को दूर करने और सख्त स्थानीयकरण आदेशों को पूरा करने के लिए घरेलू कंपोनेंट निर्माण की गति को तेज करने की आवश्यकता होगी। भारत के EV भविष्य की सफलता इसकी विनिर्माण क्षमता को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी निर्यात इंजन में बदलने और नीतिगत बदलावों व बाहरी सप्लाई चेन की निर्भरता के जोखिमों को कम करने पर निर्भर करेगी।