भारत और European Union ने मिलकर एक ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर बनाने का ऐलान किया है। इस पहल के तहत **2030** तक बड़े पोर्ट्स पर **60%** रिन्यूएबल एनर्जी का उपयोग करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि ग्लोबल सप्लाई चेन को ग्रीन और मजबूत बनाया जा सके।
मैरिटाइम सेक्टर का 'ग्रीन' कायाकल्प
'सागर मंथन 2026' कार्यक्रम के दौरान भारत और European Union ने मैरिटाइम ट्रेड को डीकार्बोनाइज करने की बड़ी योजना पेश की है। इसका मकसद शिपिंग और लॉजिस्टिक्स में कम उत्सर्जन वाले फ्यूल और ग्रीन टेक्नोलॉजी को शामिल करना है। भारत का लक्ष्य 2030 तक अपने प्रमुख बंदरगाहों (Major Ports) पर रिन्यूएबल एनर्जी का हिस्सा 60% से ऊपर ले जाने का है, जो 2047 तक 90% तक पहुंच जाएगा। इसके तहत डीजल से चलने वाले टग्स को हटाकर सस्टेनेबल विकल्प अपनाए जाएंगे।
ग्रीन हाइड्रोजन हब का उदय
सरकार ने इसके लिए Deendayal Port, Paradip Port और V.O. Chidambaranar Port को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, स्टोरेज और बंकरिंग के लिए मुख्य केंद्रों के रूप में चुना है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर समुद्री जहाजों को साफ ईंधन उपलब्ध कराने के लिए तैयार किया जा रहा है।
निवेशकों के लिए संकेत
यह बदलाव हेवी इंजीनियरिंग, पोर्ट मैनेजमेंट और रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के लिए भारी निवेश के मौके लेकर आया है। हालांकि, इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं। ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया जैसे विकल्पों को अपनाने में बहुत अधिक कैपिटल (Capital) की जरूरत होगी, जिससे कंपनियों की बैलेंस शीट पर शुरुआती दबाव बढ़ सकता है। साथ ही, ग्लोबल ट्रेड रेगुलेशंस और कार्बन टैक्स जैसे नियमों का पालन करना भी कंपनियों के लिए जरूरी होगा। निवेशकों को अब इन पोर्ट्स के टेंडर और प्रोजेक्ट टाइमलाइन पर नजर रखनी चाहिए।
