घरेलू हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या में जुलाई 2026 में 4.8% की गिरावट आई है। कुल **1.20 करोड़** यात्री ही सफर कर पाए, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या **1.26 करोड़** थी। यह कमी एयरलाइंस द्वारा अपनी कुल क्षमता में **4.7%** की कटौती का नतीजा है।
क्षमता प्रबंधन से सीट ऑक्यूपेंसी पर कसा शिकंजा?
यात्रियों की संख्या में कमी के बावजूद, एयरलाइंस ने अपनी उड़ानों में सीटों के भरने की दर (लोड फैक्टर) को बनाए रखा है। यह दिखाता है कि मांग में बड़ी गिरावट नहीं आई है, बल्कि एयरलाइंस लागत कम करने के लिए अपनी उड़ानों को मैनेज कर रही हैं। आकासा एयर ने 91.9% के लोड फैक्टर के साथ इस मेट्रिक में बाजी मारी, जबकि स्पाइसजेट और एयर इंडिया ग्रुप का लोड फैक्टर 83% से ऊपर रहा। क्षमता घटाकर, एयरलाइंस खाली सीटों पर होने वाले खर्च से बच रही हैं।
बाज़ार में दबदबा
बाजार में मुख्य खिलाड़ियों का दबदबा बना हुआ है। इंडिगो ने 67.4% मार्केट शेयर पर कब्जा बनाए रखा, जिसमें 80.82 लाख यात्री रहे। एयर इंडिया ग्रुप (जिसमें एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस शामिल हैं) 24% मार्केट शेयर के साथ 28.75 लाख यात्रियों को ले गया। आकासा एयर का मार्केट शेयर 5.5% रहा, जबकि स्पाइसजेट जैसे अन्य वाहकों का हिस्सा 1.6% था।
फ्यूल की कीमतें और भू-राजनीतिक कारक बने बड़ी चुनौती
हालांकि, उच्च लोड फैक्टर का मतलब सीधे तौर पर मुनाफा बढ़ना नहीं है। भारतीय एविएशन सेक्टर को एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की ऊंची कीमतों से लगातार दबाव झेलना पड़ रहा है। चूंकि ईंधन एयरलाइनों के ऑपरेटिंग खर्च का एक बड़ा हिस्सा होता है, इसलिए कीमतों में अस्थिरता सीधे मुनाफे को प्रभावित करती है।
इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से एयरक्राफ्ट लीज और पुर्जों की लागत बढ़ गई है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण भी कुछ एयरलाइंस को अपने फ्लाइट रूट्स बदलने पड़े, जिससे उड़ान का समय और ईंधन की खपत बढ़ गई है।
निवेशकों के लिए, क्षमता उपयोग और लाभप्रदता के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। जैसे-जैसे एयरलाइंस इन लागत दबावों से निपटेंगी, उनकी मूल्य निर्धारण शक्ति बनाए रखने की क्षमता ही तिमाही नतीजों की दिशा तय करेगी। बाजार प्रतिभागी यह भी देखेंगे कि क्या क्षमता में कटौती का यह चलन जारी रहता है, या यात्रा की मांग स्थिर होने पर एयरलाइंस फिर से उड़ानें बढ़ाती हैं।
