एफिशिएंसी बढ़ाने पर जोर
सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2024-25 के लिए लॉजिस्टिक्स पोर्ट परफॉरमेंस इंडेक्स (LPPI) का ऐलान, एक स्ट्रक्चर्ड और डेटा-ड्रिवन जवाबदेही की ओर बड़ा कदम है। इस इंडेक्स में जहाजों के टर्नअराउंड टाइम, बर्थ पर जहाजों के खाली खड़े रहने का समय और प्री-बर्थिंग वेट टाइम जैसे अहम पैमानों को मापा जाएगा। इसमें परफॉरमेंस और साल-दर-साल सुधार, दोनों को बराबर का महत्व दिया जाएगा। इस पहल का मकसद, जो पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान के तहत है, सिर्फ क्षमता बढ़ाने से आगे बढ़कर 'प्रोडक्टिविटी गैप' को दूर करना है। इसी गैप की वजह से भारत की ग्लोबल शिपिंग कॉम्पिटिटिवनेस (competitiveness) लंबे समय से प्रभावित हो रही थी।
सेक्टर की मौजूदा हालत और वैल्यूएशन
यह पॉलिसी इंटरवेंशन समुद्री सेक्टर के लिए एक मुश्किल दौर में आई है। पिछले एक साल में, लॉजिस्टिक्स और शिपिंग स्टॉक्स ने निफ्टी 50 जैसे ब्रॉडर मार्केट इंडेक्स की तुलना में काफी खराब प्रदर्शन किया है। संस्थागत निवेशकों का भरोसा कार्गो वॉल्यूम में उम्मीद से कम ग्रोथ, टैरिफ को लेकर अनिश्चितता और कोयले की सुस्त मांग के चलते कम हुआ है। जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) जैसे पोर्ट ऑपरेटर्स ने वित्त वर्ष 2025-26 में 10.2 करोड़ मीट्रिक टन से ज़्यादा का रिकॉर्ड वॉल्यूम हासिल किया है, लेकिन मार्केट अक्सर यह सवाल उठाता रहा है कि क्या इस वॉल्यूम ग्रोथ से मुनाफे में भी उतनी ही बढ़ोतरी हो रही है, या फिर यह हाई कैपिटल एक्सपेंडिचर (capital expenditure) और लगातार पोर्ट कंजेशन (congestion) की वजह से कम हो रही है।
जानकारों की चिंताएं
LPPI लॉन्च को लेकर सकारात्मक माहौल के बावजूद, स्ट्रक्चरल रिस्क (structural risk) अभी भी बड़े हैं। आलोचकों का कहना है कि डिजिटल रिफॉर्म्स, जैसे कि नए शिप रजिस्ट्रेशन और रीसाइक्लिंग क्रेडिट मॉड्यूल, इंफ्रास्ट्रक्चर की रुकावटों जैसी मुख्य चुनौती के मुकाबले गौण हैं। प्राइवेट, वर्टिकली इंटीग्रेटेड प्लेयर्स के विपरीत, जो सप्लाई चेन कंट्रोल का फायदा उठाते हैं, सरकारी संस्थाओं को अक्सर सख्त कॉस्ट स्ट्रक्चर और रेगुलेटरी देरी का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, हालांकि ब्रोकरेज का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 तक रिकवरी हो सकती है, यह काफी हद तक डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) को प्रमुख पोर्ट्स के साथ सफलतापूर्वक जोड़ने पर निर्भर करेगा। अगर कनेक्टिविटी का वादा पूरा नहीं होता है या रेल इवैक्यूएशन एफिशिएंसी में बड़ा सुधार नहीं दिखता है, तो LPPI असल परफॉरमेंस सुधार लाने के बजाय सिस्टमैटिक इनएफिशिएंसी (systematic inefficiency) का सिर्फ एक स्कोरकार्ड बनकर रह सकता है।
भविष्य का नज़रिया
इस पहल की सफलता का पैमाना सिर्फ इंडेक्स नहीं होगा, बल्कि यह कितनी जल्दी लोअर ड्वेल टाइम (dwell time) और बेहतर बर्थ प्रोडक्टिविटी (productivity) में तब्दील होता है, यह महत्वपूर्ण होगा। निवेशक ऐसे संकेतों की तलाश में हैं कि पॉलिसी एनवायरनमेंट (policy environment) एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म से निकलकर ठोस मार्जिन ग्रोथ की ओर बढ़ रहा है। भविष्य का प्रदर्शन संभवतः प्रमुख पोर्ट एसेट्स के मोनेटाइजेशन (monetization) पर निर्भर करेगा, जैसे कि JNPA की बहुचर्चित संभावित IPO, जिससे ये पब्लिक एंटिटीज पहली बार पब्लिक कैपिटल मार्केट्स की कड़ी जांच के दायरे में आएंगी।
