तत्काल राहत का बड़ा कदम
यह आदेश 8 अप्रैल को जारी किया गया है। DG Shipping ने साफ कहा है कि पोर्ट्स सभी तरह की लागू फीस, जैसे डिटेंशन, ग्राउंड रेंट और रीफर सर्विस (reefer services) में कटौती का फायदा सीधे निर्यातकों को तुरंत पहुंचाएं। पहले अक्सर इन कटौतियों का रिफंड मिलने में देरी हो जाती थी, जिससे निर्यातकों के कैश फ्लो पर दबाव पड़ता था।
क्यों बढ़ी लागत और क्या है उपाय?
यह कदम ऐसे समय में आया है जब मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के चलते लोजिस्टिक्स का खर्च आसमान छू रहा है। खासकर वॉर रिस्क प्रीमियम (WRP) में भारी इजाफा हुआ है, जो पहले करीब 0.03% से बढ़कर अब 1% तक पहुंच गया है। कुछ अहम रूट पर तो जहाजों के लिए प्रीमियम 7.5% तक जा रहा है। वहीं, शिपिंग की फ्रेट रेट्स (freight rates) में भी क्षेत्रीय संघर्ष शुरू होने के बाद से 60% से 80% तक की बढ़ोतरी हुई है।
एक्सपोर्ट पर क्या होगा असर?
इस पूरे मामले का असर भारतीय एक्सपोर्ट सेक्टर पर कई तरह से पड़ रहा है। संघर्ष वाले इलाकों से बचने के लिए जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, जिससे शिपिंग का समय और लागत दोनों बढ़ रही हैं। हॉरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे प्रमुख शिपिंग मार्गों में रुकावटें कच्चे तेल (crude oil) और एलएनजी (LNG) जैसी महत्वपूर्ण आयात वस्तुओं को भी प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में, अगर यह रुकावटें जारी रहीं, तो भारतीय निर्यातकों को $8-10 अरब तक का नुकसान हो सकता है।
सरकार और नियामक की भूमिका
यह पहली बार नहीं है जब DG Shipping ने ऐसे कदम उठाए हैं। पहले भी नियामक ने जहाज़ कंपनियों द्वारा अनुचित शुल्क वसूली पर चेतावनी जारी की है। सरकार भी निर्यातकों को सहारा देने के लिए 'RELIEF' जैसी स्कीम पर विचार कर रही है, जिसमें अतिरिक्त फ्रेट और बीमा लागत की भरपाई की जाएगी। साथ ही, घरेलू WRP पूल बनाने पर भी चर्चा हो रही है।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि, DG Shipping का यह आदेश निर्यातकों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। सभी पोर्ट्स पर इसे सख्ती से लागू करवाना एक बड़ी चुनौती होगी। वहीं, तुरंत फीस में कटौती करने से छोटे पोर्ट्स के कैश फ्लो और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश पर असर पड़ सकता है। यह आदेश आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) की कमजोरियों के मूल कारणों को सीधे हल नहीं करता, जो कि वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता से जुड़े हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि जब तक वैश्विक राजनीतिक अनिश्चितता बनी रहेगी, तब तक लोजिस्टिक्स और बीमा की लागत ऊंची रहने की संभावना है। ऐसे में, निर्यातकों के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण दौर बना रहेगा। आने वाले समय में यह भी देखा जा सकता है कि कंपनियां उत्पादन को अपने करीब या सहयोगी देशों में ले जाने पर विचार करें, जिससे व्यापार मार्ग (trade routes) बदल सकते हैं। DG Shipping के इस कदम की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पोर्ट्स इसे कैसे लागू करते हैं और भू-राजनीतिक स्थिति कैसी रहती है।