कीमतों पर लगाम, पर अंतरराष्ट्रीय उड़ानें महंगी
भारत सरकार ने घरेलू उड़ानों को बड़ी राहत देते हुए, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में बढ़ोतरी पर 25% की कैप लगा दी है। यह फैसला पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय तथा नागरिक उड्डयन मंत्रालय की ओर से आया है। होरमुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के चलते वैश्विक तेल कीमतों में 100% से भी ज्यादा का उछाल आया है, जिसका असर ATF की कीमतों पर साफ दिख रहा था। 1 अप्रैल, 2026 से घरेलू उड़ानों के लिए ATF की कीमत में 25% से ज्यादा की बढ़ोतरी नहीं होगी। इससे घरेलू हवाई किराए को स्थिर रखने में मदद मिलेगी। दिल्ली में 1 अप्रैल, 2026 तक ATF की कीमत ₹1,04,927 प्रति किलोलीटर दर्ज की गई थी। हालांकि, यह राहत उन उड़ानों के लिए नहीं है जो अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर संचालित होती हैं, उन्हें पूरी बाजार दर पर ईंधन खरीदना होगा।
एविएशन सेक्टर पर बढ़ते दबाव और घाटे का साया
घरेलू उड़ानों पर कैप के बावजूद, भारतीय एविएशन सेक्टर कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। रेटिंग एजेंसी ICRA ने इस क्षेत्र के लिए अपने आउटलुक को 'Negative' यानी नकारात्मक कर दिया है। इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें बिगड़ते भू-राजनीतिक तनाव, गिरता हुआ भारतीय रुपया और ATF की बढ़ती कीमतें शामिल हैं। इस वित्त वर्ष (FY2026) के लिए घरेलू यात्री यातायात वृद्धि का अनुमान घटाकर केवल 0-3% कर दिया गया है, जो पहले के अनुमानों से काफी कम है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय यातायात में 7-9% की वृद्धि का अनुमान है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 में यह पूरा सेक्टर ₹17,000 करोड़ से ₹18,000 करोड़ तक का भारी नेट लॉस झेल सकता है। ऑपरेटिंग एक्सपेंसेस का 30-40% हिस्सा ईंधन पर खर्च होता है, और अन्य लागतों का 35-50% अमेरिकी डॉलर में चुकाना पड़ता है। यह स्थिति एयरलाइंस को मुद्रा में गिरावट और वैश्विक मूल्य झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। इन सबके अलावा, लगभग 13-15% एयरलाइन फ्लीट सप्लाई चेन और इंजन की समस्याओं के कारण खड़ी (grounded) हैं, जो संचालन को और बाधित कर रही हैं।
कीमत में असमानता से एयरलाइंस की मुश्किल बढ़ी
जबकि सरकार की फ्यूल प्राइस कैप घरेलू उड़ानों के लिए कुछ राहत जरूर देती है, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ATF की कीमतों में अंतर एयरलाइंस के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है। जिन एयरलाइंस के पास अंतरराष्ट्रीय रूट्स का बड़ा नेटवर्क है, उन्हें केवल घरेलू यात्रा पर केंद्रित एयरलाइंस की तुलना में प्रति लीटर अधिक ईंधन खर्च करना पड़ेगा। इससे प्रतिस्पर्धा में भी अंतर बढ़ सकता है। होरमुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल का लगभग 20% हिस्सा ले जाता है, में जारी व्यवधान के कारण जेट फ्यूल की कीमतों में सिर्फ चार हफ्तों में दोगुनी बढ़ोतरी हुई है। यह मूल्य अस्थिरता एयरलाइंस के मुनाफे पर भारी दबाव डाल रही है, खासकर स्पाइसजेट (SpiceJet) जैसी कंपनियों पर। स्पाइसजेट की वित्तीय स्थिति कमजोर है और उसके पास सीमित फ्यूल हेजिंग है, जो उसकी जरूरतों का केवल 15% कवर करती है। डॉलर-आधारित लागतों पर निर्भरता के कारण कमजोर रुपया भी मुनाफे को और प्रभावित करता है। विश्लेषकों के अनुमानों के नकारात्मक होने और बड़े घाटे की आशंका के बीच, किसी भी बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम से एयरलाइंस को फ्लाइट्स रद्द करने या किराए बढ़ाने जैसे कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं, जिससे मांग प्रभावित हो सकती है। एयरलाइंस तेल कंपनियों के साथ 'क्रैक स्प्रेड' (ATF मूल्य निर्धारण का एक हिस्सा) को सीमित करने के तरीकों पर भी चर्चा कर रही हैं ताकि लागत में अत्यधिक वृद्धि को रोका जा सके।
अनिश्चितता के बीच भविष्य पर प्रश्नचिह्न
भारतीय एविएशन सेक्टर एक अनिश्चितता भरे दौर से गुजर रहा है, जो अस्थिर वैश्विक ऊर्जा कीमतों और जारी भू-राजनीतिक तनावों से तय हो रहा है। ICRA को वित्त वर्ष 2026 में घरेलू यातायात में धीमी 0-3% और अंतरराष्ट्रीय यातायात में 7-9% की वृद्धि की उम्मीद है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि एयरलाइंस कितना प्रभावी ढंग से बढ़ी हुई ईंधन लागत को यात्रियों पर किराए के रूप में डाल पाती हैं, हालांकि इससे मूल्य-संवेदनशील बाजार में मांग कम होने का खतरा है। एयरलाइंस अपनी क्षमता को समायोजित कर सकती हैं, और ATF मूल्य निर्धारण मॉडल में संभावित बदलावों पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, जैसे कि क्रैक स्प्रेड को सीमित करना। मार्केट लीडर इंडिगो (IndiGo), अपनी मजबूत परिचालन और वित्तीय स्थिति के साथ, इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपने अधिक वित्तीय रूप से कमजोर प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बेहतर स्थिति में दिखती है।