भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा शिप रीसाइक्लिंग हब बन गया है, जिसने 2025 में **2.99 मिलियन ग्रॉस टन** माल को रीसायकल किया। गुजरात के अलंग यार्ड में क्षमता दोगुनी करने की तैयारी है और यह सेक्टर अब 'ग्रीन' प्रैक्टिस की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, निवेशकों को पर्यावरण नियमों, स्टील की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे जोखिमों पर भी नजर रखनी होगी।
क्या हुआ?
हालिया डेटा के अनुसार, भारत आधिकारिक तौर पर दुनिया का सबसे बड़ा शिप रीसाइक्लिंग नेशन बन गया है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के आंकड़ों के मुताबिक, देश ने 2025 में 2.99 मिलियन ग्रॉस टन (GT) रीसाइक्लिंग वॉल्यूम दर्ज किया, जो 2024 के 1.86 मिलियन GT की तुलना में लगभग 60% अधिक है। इस ग्रोथ की बदौलत भारत ने ग्लोबल शिप रीसाइक्लिंग मार्केट में 35.4% की हिस्सेदारी हासिल कर ली है, जो उसके 2030 के लक्ष्य से काफी पहले ही पूरा हो गया है। सरकार अब देश की रीसाइक्लिंग क्षमता को लगभग 9 मिलियन लाइट डिस्प्लेसमेंट टन (LDT) तक दोगुना करने की योजना बना रही है, जिसमें गुजरात का अलंग शिप रीसाइक्लिंग यार्ड इस विस्तार का मुख्य केंद्र होगा।
'ग्रीन' रीसाइक्लिंग की ओर बदलाव
सालों से, ग्लोबल शिप रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी चिंताओं को लेकर आलोचनाओं का सामना कर रही थी, खासकर दक्षिण एशिया में। भारत की इस तरक्की का एक बड़ा कारण 'ग्रीन' या सुरक्षित रीसाइक्लिंग प्रैक्टिस की ओर उसका बदलाव है। हॉन्ग कॉन्ग इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर द सेफ एंड एनवायरनमेंटली साउंड रीसाइक्लिंग ऑफ शिप्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाकर, भारतीय यार्ड्स ग्लोबल शिपओनर्स के लिए अधिक आकर्षक बन गए हैं। यह कदम भारत को बांग्लादेश, पाकिस्तान और तुर्की जैसे प्रतिस्पर्धियों से अलग करने की एक रणनीतिक चाल है, जो शिपब्रेकिंग में प्रमुख खिलाड़ी हैं। अलंग के लिए सरकारी मास्टर प्लान का उद्देश्य इस प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को बनाए रखने के लिए बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण करना है।
इकोनॉमी और स्टील का कनेक्शन
शिप रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री असल में एक मेटल रिकवरी का बिजनेस है। जहाजों को तोड़कर स्टील निकाला जाता है, जिसे फिर रीसायकल करके कंस्ट्रक्शन और मैन्युफैक्चरिंग कामों के लिए बेचा जाता है। इसलिए, भारतीय शिप रीसाइक्लिंग यार्ड्स की प्रॉफिटेबिलिटी सीधे तौर पर ग्लोबल और डोमेस्टिक स्टील की कीमतों से जुड़ी हुई है। जब स्टील की कीमतें ऊंची होती हैं, तो शिप रीसाइक्लिंग एक लाभदायक गतिविधि बन जाती है। इसके विपरीत, स्टील की कीमतों में गिरावट आने पर रीसाइक्लिंग यार्ड्स के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। निवेशकों को इस इंडस्ट्री को साइक्लिकल (चक्रीय) के रूप में देखना चाहिए, क्योंकि यह ग्लोबल शिपिंग कंपनियों द्वारा रिटायर किए जा रहे जहाजों की संख्या और स्क्रैप स्टील की मांग पर बहुत निर्भर करती है।
जोखिम और चुनौतियां
जहां इंडस्ट्री का विस्तार हो रहा है, वहीं इसे महत्वपूर्ण जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है। यह सेक्टर पर्यावरण और लेबर सेफ्टी नियमों के प्रति बहुत संवेदनशील है। सुरक्षा या पर्यावरण मानकों में कोई भी चूक नियामक कार्रवाई या अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लाइनों से बिजनेस का नुकसान करा सकती है, जो ग्रीन रीसाइक्लिंग को प्राथमिकता देती हैं। इसके अलावा, यह इंडस्ट्री एक प्रतिस्पर्धी माहौल में काम करती है जहां अन्य देश मार्केट शेयर हासिल करने के लिए लागत कम कर सकते हैं। प्रस्तावित विस्तार के संबंध में एग्जीक्यूशन रिस्क (कार्यन्वयन जोखिम) की चुनौती भी है। अलंग में बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करने के लिए महत्वपूर्ण निवेश और भूमि प्रबंधन की आवश्यकता होती है, जिसमें देरी या लागत वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है।
आगे क्या देखें?
इस स्पेस को ट्रैक करने वाले निवेशकों को दो मुख्य कारकों पर नजर रखनी चाहिए। पहला, डोमेस्टिक और ग्लोबल स्टील प्राइस ट्रेंड्स पर ध्यान दें, क्योंकि ये सीधे रीसाइक्लिंग यार्ड्स के रेवेन्यू को प्रभावित करते हैं। दूसरा, अलंग इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की प्रगति पर नज़र रखें। क्षमता उन्नयन की समय-सीमा और यार्ड्स की उच्च पर्यावरण अनुपालन मानकों को बनाए रखने की क्षमता यह निर्धारित करेगी कि क्या भारत ग्लोबल मार्केट में अपनी लीडरशिप पोजीशन बनाए रख सकता है।
