सेक्टर पर बाहरी दबाव भारी
इस इंडस्ट्री के निराशाजनक भविष्य की सबसे बड़ी वजह एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में अचानक आई भारी तेजी है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते ATF की कीमतें फरवरी 2026 से मार्च 2026 के बीच 5.7% उछलकर करीब ₹96,638 प्रति किलोलीटर तक पहुँच गई हैं। कच्चे तेल की कीमतें $105 प्रति बैरल के करीब पहुंचने से यह दबाव और बढ़ गया है। गौरतलब है कि ईंधन एयरलाइंस के कुल ऑपरेटिंग खर्च का 30-40% होता है, इसलिए यह सीधा असर मुनाफे पर डाल रहा है।
इसके अलावा, डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का कमजोर होना भी एयरलाइंस के लिए मुश्किलें बढ़ा रहा है। विमान लीज (Lease) और मेंटेनेंस जैसे डॉलर में होने वाले खर्च, जो कुल खर्च का 35-50% होते हैं, और महंगे हो गए हैं। इन बाहरी झटकों के कारण एनालिस्ट्स का मानना है कि फाइनेंशियल ईयर 2026 में घरेलू यात्री ट्रैफिक ग्रोथ घटकर सिर्फ 0-3% रह सकती है, जो पिछले सालों के मुकाबले काफी कम है। रेटिंग एजेंसी ICRA ने भी सेक्टर के आउटलुक को 'स्टेबल' से बदलकर 'नेगेटिव' कर दिया है।
सुरक्षा और ऑपरेशनल मुद्दे भी बने बड़ी सिरदर्द
सिर्फ बाहरी लागतें ही नहीं, बल्कि भारत का एविएशन सेक्टर गहरी अंदरूनी समस्याओं से भी जूझ रहा है। सबसे गंभीर है सुरक्षा का मामला। 2026 के लिए जारी टॉप 25 सबसे सुरक्षित ग्लोबल एयरलाइंस की लिस्ट में कोई भी भारतीय एयरलाइन शामिल नहीं है। वहीं, एयर इंडिया की सुरक्षा स्थिति चिंताजनक है। जुलाई 2025 में हुए एक ऑडिट में 51 सुरक्षा खामियां पाई गईं, जिनमें पायलट ट्रेनिंग और सिमुलेटर से जुड़े मुद्दे शामिल थे। साल 2026 की शुरुआत में हुए निरीक्षणों में भी एयर इंडिया के 80% से ज्यादा विमानों में बार-बार तकनीकी दिक्कतें सामने आईं, जो प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले काफी ज्यादा है।
ऑपरेशनल अस्थिरता का एक बड़ा उदाहरण दिसंबर 2025 में IndiGo के साथ देखने को मिला, जब पायलटों के ड्यूटी समय सीमा से जुड़े नए नियमों के चलते हजारों उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। इस घटना ने मार्केट कंसंट्रेशन (Market Concentration) की समस्या को भी उजागर किया और दिखाया कि कैसे हाई यूटिलाइजेशन (High Utilization) के लिए ऑप्टिमाइज की गई एयरलाइंस रेगुलेटरी बदलावों के साथ तालमेल बिठाने में संघर्ष करती हैं। इसी बीच, सरकार ने प्रतियोगिता बढ़ाने के उद्देश्य से 2025 के अंत में तीन नई डोमेस्टिक कैरियर्स (Domestic Carriers) को मंजूरी दी है। वहीं, एयर इंडिया की बात करें तो, जून 2025 की एक घातक दुर्घटना और पाकिस्तान के एयरस्पेस बंद होने जैसे कारणों से इसके लिए मुनाफे की राह और भी मुश्किल हो गई है। कंपनी को फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए ₹15,000 करोड़ से ज्यादा के नुकसान का अनुमान है, और अगले तीन से चार साल तक मुनाफा होने की उम्मीद नहीं है।
गवर्नेंस और बाजार की कमियां
सुरक्षा और ऑपरेशनल मुद्दों का यह मेल सेक्टर में गवर्नेंस (Governance) की गंभीर चिंताओं को दर्शाता है। एयर इंडिया की लगातार आ रही तकनीकी दिक्कतें और पिछली सुरक्षा ऑडिट की रिपोर्टें इसके रीस्ट्रक्चरिंग (Restructuring) प्रयासों और एक मजबूत सुरक्षा संस्कृति बनाने की क्षमता पर सवाल खड़े करती हैं। दूसरी ओर, वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों के विपरीत, जो बड़ी मात्रा में फ्यूल की हेजिंग (Hedging) करते हैं, भारतीय एयरलाइंस अक्सर स्पॉट मार्केट (Spot Market) से ईंधन खरीदती हैं, जिससे वे कीमतों में अचानक आए उछाल के प्रति बहुत संवेदनशील हो जाती हैं।
सेक्टर की सरकार पर निर्भरता भी एक बड़ा मुद्दा है। जेट फ्यूल पर टैक्स कटौती और सीट आवंटन जैसे नियमों में बदलाव के लिए बाहरी समर्थन की आवश्यकता, ऑर्गेनिक कॉम्पिटिटिव स्ट्रेंथ (Organic Competitive Strength) पर निर्भरता कम करती है। इसके अलावा, विमानों की डिलीवरी में हो रही भारी देरी, जहां लगभग 1,700 प्लेन के ऑर्डर के लिए 15 साल तक का इंतजार करना पड़ सकता है, भविष्य में ग्रोथ और बेड़े को अपग्रेड करने की क्षमता को सीमित कर सकती है।
भविष्य बाहरी कारकों और नीतिगत समर्थन पर निर्भर
भारतीय एविएशन सेक्टर का भविष्य काफी हद तक पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और जेट फ्यूल की कीमतों में स्थिरता पर टिका है। ICRA का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2027 तक कुल नुकसान घटकर ₹11,000 से ₹12,000 करोड़ रह सकता है, हालांकि यह आंकड़ा और कम भी हो सकता है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) लागत का दबाव कम करने के लिए जेट फ्यूल पर टैक्स में कटौती जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है। साथ ही, 20 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले नए नियमों के तहत एयरलाइंस को कम से कम 60% सीटें तय कीमतों पर ऑफर करनी होंगी, ताकि बढ़ती किराए के बीच यात्रियों को राहत मिल सके।
मगर, कुल मिलाकर सेक्टर का रास्ता अनिश्चित बना हुआ है। यह कितना भी वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव, मुद्रा के हेरफेर और एयर इंडिया जैसे प्रमुख एयरलाइंस के रीस्ट्रक्चरिंग प्रयासों की सफलता पर निर्भर करेगा।