क्यों वापस लिया गया नियम?
एयरलाइन इंडस्ट्री की भारी आपत्तियों के बाद सरकार ने यह बड़ा फैसला लिया है। इंडस्ट्री के बड़े खिलाड़ियों, जिनमें Federation of Indian Airlines का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रमुख कंपनियाँ शामिल हैं, का तर्क था कि यह नियम मौजूदा फेयर स्ट्रक्चर (fare structure) को बिगाड़ देगा और ओपन प्राइसिंग सिस्टम (open pricing system) के खिलाफ है। उनका कहना था कि इससे उनके रेवेन्यू मॉडल पर नकारात्मक असर पड़ेगा और संभावित रूप से टिकटों के दाम बढ़ाने पड़ सकते हैं। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) हालांकि, यात्रियों के लिए सीट अलॉटमेंट और को-सीटिंग (co-seating) जैसी अन्य पैसेंजर-फ्रेंडली नीतियों को लागू करना जारी रख सकता है।
सेक्टर को मिली वित्तीय संजीवनी
यह रेगुलेटरी बदलाव (regulatory pause) भारतीय एयरलाइन्स के लिए एक अहम वित्तीय सहारा है, खासकर ऐसे समय में जब यह सेक्टर भारी लागतों और मुश्किलों भरे मार्केट माहौल से गुजर रहा है। भारतीय एविएशन मार्केट के 2034 तक $45.59 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, और FY26 तक डोमेस्टिक पैसेंजर ट्रैफिक 165-170 मिलियन तक जा सकता है।
हालांकि, ICRA ने हाल ही में जियोपॉलिटिकल टेंशन (geopolitical tensions), कमजोर होते रुपये और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की बढ़ती कीमतों का हवाला देते हुए सेक्टर के आउटलुक को 'स्टेबल' से घटाकर 'नेगेटिव' कर दिया है। ICRA का अनुमान है कि FY2026 में इंडस्ट्री को कुल ₹170-180 बिलियन का शुद्ध नुकसान हो सकता है।
प्रमुख खिलाड़ियों पर असर
इंडिगो (IndiGo) जैसी प्रमुख एयरलाइन, जो डोमेस्टिक मार्केट में 60% से अधिक हिस्सेदारी रखती है, का P/E रेश्यो 35.8 से 49.94 के बीच है, जो इसके ग्रोथ और मजबूत मार्केट पोजिशन पर निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है। वहीं, स्पाइसजेट (SpiceJet) का P/E रेश्यो नेगेटिव (-0.88 से -1.95) है, जो भारी नुकसान का संकेत देता है। नई एयरलाइन अकासा एयर (Akasa Air) तेजी से विस्तार कर रही है, लेकिन FY 2024-25 में इसे ₹19.83 बिलियन का नेट लॉस हुआ है। इस नियम के हटने से इन एयरलाइन्स, खासकर इंडिगो को अपना रेवेन्यू ऑप्टिमाइज़ करने और प्राइसिंग फ्लेक्सिबिलिटी बनाए रखने में मदद मिलेगी, जो करंट कॉस्ट-सेंसिटिव माहौल में प्रॉफिटेबिलिटी के लिए महत्वपूर्ण है।
कॉम्पिटिशन पर प्रभाव
इंडिगो की सबसे बड़ी मार्केट शेयर के साथ, उसके बाद एयर इंडिया/एयर इंडिया एक्सप्रेस, अकासा एयर और स्पाइसजेट जैसी कंपनियाँ हैं। इस नियम को सस्पेंड करने से कॉम्पिटिशन के मैदान को बराबर करने में मदद मिलेगी। पहले एयरलाइन्स को मंत्रालय द्वारा लगाए गए फेयर कैप (fare caps) का सामना करना पड़ता था। फिलहाल 87% से अधिक के लोड फैक्टर (load factors) से मजबूत डिमांड का संकेत मिलता है, जिसे अब एयरलाइन्स प्रभावी ढंग से भुना सकती हैं।
सेक्टर के जोखिम अभी भी बरकरार
तत्काल राहत के बावजूद, भारतीय एविएशन सेक्टर अभी भी कई जोखिमों से घिरा है। फ्यूल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और करेंसी में अस्थिरता जैसे मुद्दे ऑपरेशनल एक्सपेंसेस (operating expenses) का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं। सप्लाई चेन में रुकावटों के कारण ग्राउंडेड एयरक्राफ्ट (grounded aircraft) भी कैपेसिटी को सीमित करते हैं। दिसंबर 2025 में इंडिगो को रेगुलेटरी नॉन-कंप्लायंस (regulatory non-compliance) के कारण बड़े पैमाने पर फ्लाइट कैंसिलेशन का सामना करना पड़ा था, जिससे स्टॉक प्राइस में गिरावट आई थी। FY2026 के लिए इंडस्ट्री के अनुमानित शुद्ध नुकसान (net losses) एयरलाइन फाइनेंस की नाजुकता को दर्शाते हैं। सीट एलोकेशन रोलबैक एक राहत है, लेकिन फंडामेंटल कॉस्ट प्रेशर और भविष्य की अस्थिरता निवेशकों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनी रहेगी।