जून 2026 में भारत के एयरपोर्ट्स पर एयर कार्गो हैंडलिंग में सालाना 16% की बढ़ोतरी देखी गई, जो रिकॉर्ड 364,289 टन तक पहुँच गई। इंटरनेशनल माल ढुलाई में 19% की जबरदस्त बढ़ोतरी ने इस ग्रोथ को लीड किया, जबकि दिल्ली सबसे व्यस्त हब बना रहा। यह आंकड़े मजबूत व्यापार गतिविधि को दर्शाते हैं, हालांकि लॉजिस्टिक्स कंपनियों को टर्मिनल क्षमता और रेगुलेटरी प्रक्रियाओं को तेज करने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
कार्गो वॉल्यूम में आई रिकॉर्ड उछाल
जून 2026 में भारत के एयर फ्रेट सेक्टर में जबरदस्त उछाल देखा गया, कुल कार्गो की मात्रा रिकॉर्ड 364,289 टन तक पहुँच गई। एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, यह जून 2025 के 315,272 टन के मुकाबले 16% ज्यादा है। कार्गो की बढ़ती मांग इस सेक्टर के लिए एक मजबूत संकेत है, जिसमें इंटरनेशनल ट्रेड का बड़ा योगदान रहा है।
इंटरनेशनल ट्रेड का दबदबा
रिकॉर्ड तोड़ परफॉरमेंस में इंटरनेशनल शिपमेंट्स का सबसे बड़ा हाथ रहा, जिन्होंने कुल वॉल्यूम का लगभग 64% यानी 231,736 टन कार्गो संभाला। यह सेगमेंट पिछले साल की तुलना में 19% बढ़ा है, जो एक्सपोर्टर्स और इम्पोर्टर्स की लगातार मांग को दिखाता है। डोमेस्टिक कार्गो में भी 9% की अच्छी बढ़ोतरी हुई और यह 132,553 टन रहा। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में कुल 1.08 मिलियन टन कार्गो हैंडल किया गया, जो पिछले साल की समान अवधि से 12% ज्यादा है।
प्रमुख कार्गो हब और रीजनल ट्रेंड्स
दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट देश का सबसे व्यस्त कार्गो हब बना रहा, जहाँ लगातार तीसरे महीने एक लाख टन से ज्यादा कार्गो की प्रोसेसिंग हुई। मुंबई दूसरे स्थान पर रहा, जबकि बेंगलुरु के केम्पेगौडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने दक्षिण भारत में अपनी स्थिति मजबूत की। बेंगलुरु ने चेन्नई को 12,200 टन से ज्यादा के अंतर से पीछे छोड़ दिया। बेंगलुरु में हुई यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से वहां की बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और इंटरनेशनल व डोमेस्टिक कार्गो हैंडलिंग में लगातार अच्छे परफॉरमेंस का नतीजा है।
मांग को प्रभावित करने वाले कारक और भविष्य के रिस्क
कार्गो वॉल्यूम में इस बढ़त के पीछे कई कारण हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव में आई कमी और स्वेज नहर मार्ग से थोड़ी दूरी बनाने के कारण, कई कंपनियों ने टाइम-सेंसिटिव सामानों के लिए एयर ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाया। इसके अलावा, घटी हुई इन्वेंट्री को फिर से भरने की जरूरत और पश्चिमी देशों में पेरिशेबल प्रोडक्ट्स के नए एक्सपोर्ट मार्केट्स खुलने से भी वॉल्यूम को बूस्ट मिला।
हालांकि, यह ग्रोथ के आंकड़े सकारात्मक हैं, पर इस मोमेंटम को बनाए रखने के लिए सेक्टर पर लगातार दबाव रहेगा। एक्सपर्ट्स का कहना है कि लम्बी अवधि के विस्तार के लिए एयरपोर्ट्स को अपनी टर्मिनल क्षमता बढ़ानी होगी और लैंडसाइड कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना होगा। इसके अलावा, रेगुलेटरी प्रक्रियाओं की एफिशिएंसी और डेडिकेटेड फ्रेटर एयरक्राफ्ट को आकर्षित करने की क्षमता भी अहम होगी। लॉजिस्टिक्स और एविएशन सेक्टर पर नजर रखने वाले इन्वेस्टर्स इस बात पर ध्यान देंगे कि क्या अलग-अलग एयरपोर्ट ऑपरेटर्स इन क्षमता संबंधी बाधाओं को सफलतापूर्वक पार कर पाते हैं और क्या मौजूदा एक्सपोर्ट डिमांड आने वाली तिमाहियों में स्थिर बनी रहती है।
