एविएशन फाइनेंस में भारत का बड़ा दांव!
एविएशन फाइनेंस और लीजिंग सेक्टर को पंख लगाने के लिए भारत सरकार नई पॉलिसीज़ पर तेजी से काम कर रही है। इन पहलों का सीधा लक्ष्य GIFT City को एविएशन फाइनेंस का एक बड़ा ग्लोबल सेंटर बनाना है। इसके लिए फ्रैक्शनल एयरक्राफ्ट ओनरशिप के नियम बनाए जा रहे हैं, और एयरक्राफ्ट को भी इन्फ्रास्ट्रक्चर एसेट का दर्जा देने पर विचार हो रहा है।
इस कदम से देश में लीजिंग और फाइनेंसिंग की क्षमताएं बढ़ेंगी, जिससे ज़्यादातर वैल्यू इंडिया में ही रहेगी और विदेशी मार्केट्स पर निर्भरता कम होगी। ग्लोबल एयरक्राफ्ट लीजिंग मार्केट बहुत बड़ा है, जो 2026 तक करीब $238 बिलियन से बढ़कर 2035 तक $458 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। इस समय यूरोप, खासकर आयरलैंड, इस मार्केट में 35-50% हिस्सेदारी के साथ आगे है। भारत की हिस्सेदारी अभी इन बड़े सेंटर्स के मुकाबले काफी कम है।
GIFT City के फायदे और मौजूदा स्थिति
GIFT City में कई आकर्षक टैक्स छूट मिल रही हैं, जिसमें 20 साल का टैक्स हॉलिडे और उसके बाद 15% का कॉर्पोरेट टैक्स रेट शामिल है। साथ ही, हॉलिडे के दौरान कैपिटल गेन पर भी छूट है। दिसंबर 2025 तक, GIFT IFSC में 38 लीजिंग फर्म्स रजिस्टर्ड हो चुकी हैं, जिन्होंने 196 एयरक्राफ्ट और 89 इंजन की देखरेख की है। हाल ही में Air India ने भी GIFT IFSC के जरिए एक A350 लीज पर लिया है, जो इस दिशा में एक ठोस प्रगति है। हालांकि, ग्लोबल रैंकिंग में 46th-52nd नंबर पर आने वाले GIFT City को डबलिन और सिंगापुर जैसे पुराने हब्स का मुकाबला करने के लिए अपने इकोसिस्टम और लिक्विडिटी को और बेहतर बनाने की जरूरत है।
फ्रैक्शनल ओनरशिप और इन्फ्रास्ट्रक्चर का दर्जा
जून 2026 तक फ्रैक्शनल ओनरशिप के लिए एक स्पेशल ऑपरेटर कैटेगरी और आसान टैक्स नियम आने की उम्मीद है, जिससे एयरक्राफ्ट की ओनरशिप ज़्यादा सुलभ हो सकती है। वहीं, एयरक्राफ्ट को इन्फ्रास्ट्रक्चर एसेट मानने से इस सेक्टर में ज़्यादा इन्वेस्टमेंट आने की उम्मीद है। इन कदमों से उन पुरानी समस्याओं को दूर करने की कोशिश है, जहां भारत का ज़्यादातर फ्लीट विदेश से लीज पर लिया जाता था, जिससे भारी फॉरेन एक्सचेंज का नुकसान होता था और विदेशी लीगल सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता था। ये नियम भारत को केप टाउन कन्वेंशन (Cape Town Convention) जैसे ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुरूप लाने के लिए डिजाइन किए गए हैं।
चुनौतियां और जोखिम
हालांकि, राह आसान नहीं है। भारतीय एविएशन सेक्टर इस वक्त भारी वित्तीय संकट से जूझ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY2026) में ₹170-180 अरब के नेट लॉस का अनुमान है। इसका मुख्य कारण ईंधन की ऊंची कीमतें (जो 30-40% खर्च का हिस्सा हैं), करेंसी में गिरावट और ग्लोबल सप्लाई चेन की दिक्कतें हैं। इस वित्तीय दबाव के कारण एयरलाइंस के लिए बेहतर लीजिंग टर्म्स हासिल करना मुश्किल हो रहा है। रेगुलेटरी देरी, जैसे कि बैंक अप्रूवल में 3 महीने तक का समय लगना और एयरक्राफ्ट वापस लेने जैसी प्रक्रियाओं में समस्याएं, भी प्रगति में बाधा डाल रही हैं।
प्रस्तावित नियम अभी भी तैयार किए जा रहे हैं, और कई की इम्प्लीमेंटेशन डेट्स स्पष्ट नहीं हैं। उदाहरण के लिए, एयरक्राफ्ट को इन्फ्रास्ट्रक्चर एसेट मानने के नियमों को और स्पष्ट करने की जरूरत है ताकि इसके लाभ साफ हों। फ्रैक्शनल ओनरशिप के लिए टैक्स (GST, डेप्रिसिएशन, इंपोर्ट ड्यूटी) और स्टैंडर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स की कमी कानूनी और वित्तीय जोखिम पैदा कर सकती है। भारत का फ्रेमवर्क अभी भी विकसित हो रहा है, जबकि डबलिन जैसे हब्स के पास दशकों का अनुभव और मजबूत लीगल सपोर्ट है। भारतीय एयरलाइंस का कर्ज और ईंधन कीमतों के प्रति संवेदनशीलता, डोमेस्टिक डील्स में शामिल लेंडर्स और लेसर के लिए एक बड़ा जोखिम है। GIFT City टैक्स छूट दे रहा है, लेकिन इसका ओवरऑल इकोसिस्टम और टैलेंट पूल अभी भी ग्लोबल लीडर्स से पीछे है। भारत का 80% से ज़्यादा फ्लीट ओवरसीज से लीज पर है, जो मौजूदा विदेशी रिश्तों की मजबूती को दर्शाता है।
सरकार चाहती है कि भारत ग्लोबल एविएशन फाइनेंस में एक बड़ा प्लेयर बने, जो मौजूदा हब्स के साथ मिलकर काम करे। इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पॉलिसी अनाउंसमेंट्स को प्रैक्टिकल नियमों में कितनी जल्दी बदला जाता है, खासकर टैक्स और फ्रैक्शनल ओनरशिप के लिए स्पष्ट कॉन्ट्रैक्ट्स के मामले में। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर चुनौतियों से पार पा लिया जाए, तो भारत का लीजिंग मार्केट करीब $100 अरब तक पहुंच सकता है, जिससे डोमेस्टिक कैपिटल के लिए अवसर पैदा होंगे और फॉरेन एक्सचेंज का फ्लो कम होगा। 2047 तक एक सेल्फ-सफिशिएंट एविएशन फाइनेंस इकोसिस्टम बनाने के लक्ष्य में GIFT City का डेवलपमेंट अहम है।
