लागतों का बोझ और रूट में कटौती
InterGlobe Aviation, जो IndiGo के नाम से जानी जाती है, ने मैनचेस्टर के लिए अपनी उड़ानें बंद करने और एक लीज पर लिए गए Boeing 787-9 Dreamliner को वापस करने का बड़ा फैसला लिया है। कंपनी का कहना है कि यह कदम एयरस्पेस की दिक्कतें और बढ़ती महंगाई के जवाब में उठाया गया है। वाइड-बॉडी प्लेन की लीज वापस करने का मतलब है कि कंपनी अपनी लॉन्ग-हॉल (लंबी दूरी की) उड़ान योजनाओं से पीछे हट रही है। IndiGo ऐसे माहौल में काम कर रही है जहां तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और पुरानी रूट्स पर कड़े कंपटीशन से कमाई पर असर पड़ रहा है। इंटरनेशनल रूट्स को कम करके, कंपनी अपने मार्जिन को स्थिर करने की कोशिश कर रही है, लेकिन इससे उसे ग्लोबल प्लेयर्स के मुकाबले मार्केट शेयर खोने का खतरा भी है, जो लंबी दूरी के कनेक्टिविटी पर फोकस कर रहे हैं।
सरकारी सब्सिडी का सहारा और वैल्यूएशन
बाजार का भरोसा फिलहाल सरकार की ₹100 अरब की फ्यूल प्राइसिंग स्कीम पर टिका है। यह स्कीम तेल कंपनियों के लिए कीमतों में भारी उछाल के जोखिम को कम करती है, जिससे एयरलाइन्स को एक निश्चित लिक्विडिटी मिलती है। हालांकि, सरकारी मदद पर निर्भरता रेगुलेटरी जोखिम बढ़ाती है। क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में IndiGo का वैल्यूएशन, खासकर प्राइस-टू-अर्निंग मल्टीपल, मार्जिन में हो रही गिरावट को ठीक से नहीं दिखाता। Morgan Stanley के एनालिस्ट्स को डबल-डिजिट गेन की उम्मीद है, लेकिन यह तभी संभव है जब कंपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी में सुधार करे। कंपनी को पिछले अठारह महीनों से इंजन मेंटेनेंस और सप्लाई चेन की दिक्कतों के कारण ग्राउंड-टाइम से जूझना पड़ रहा है।
दूसरी तरफ, एक्सपर्ट्स की राय
एक गंभीर विश्लेषण से पता चलता है कि कंपनी में कुछ ऐसी कमजोरियां हैं जिन पर ऑप्टिमिस्टिक अनुमानों में अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। दूसरी एयरलाइन्स के विपरीत, IndiGo खास नैरो-बॉडी इंजन टेक्नोलॉजी पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जिसमें बार-बार दिक्कतें आ रही हैं। लीज पर लिए गए Boeing प्लेन को वापस करने से यह संकेत मिलता है कि वाइड-बॉडी ऑपरेशंस के लिए कॉस्ट-बेनिफिट एनालिसिस नेगेटिव हो गया है, जिससे कंपनी की प्रीमियम-टियर स्ट्रेटेजी पर सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा, सरकार से मिलने वाली मदद ऑपरेशनल इनएफिशिएंसी के लिए एक सब्सिडी की तरह काम करती है। अगर सरकार यह मदद बंद कर दे या दूसरे ट्रांसपोर्ट सेक्टरों पर ध्यान केंद्रित करे, तो कंपनी को सीधे तौर पर ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ेगा। मैनेजमेंट के लिए इस मुश्किल दौर से निकलना इस बात पर निर्भर करेगा कि वह डोमेस्टिक मार्केट में अपनी पकड़ कितनी मजबूत रख पाती है। साथ ही, फ्लीट को मॉडर्न बनाने और हाई-इंटरेस्ट लीज की देनदारियों को मैनेज करने के लिए लगने वाली भारी कैपिटल से प्रॉफिटेबल ग्रोथ का रास्ता बहुत संकरा हो जाता है।
आगे क्या? निवेशक क्या देखें?
निवेशकों को आने वाली फ्लीट यूटिलाइजेशन रिपोर्ट्स पर नजर रखनी चाहिए ताकि आगे और एसेट्स बेचने के संकेत मिल सकें। हालांकि ब्रोकरेज फर्म्स का झुकाव बुलिश (तेजी का) है, लेकिन इंस्टीट्यूशनल प्राइस टारगेट्स और मौजूदा टेक्निकल सपोर्ट लेवल्स के बीच का अंतर बताता है कि आने वाले क्वार्टर में स्टॉक में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। आगे की ग्रोथ नेटवर्क बढ़ाने पर नहीं, बल्कि डिमांड में नरमी आने पर भी कंपनी की प्रति सीट कमाई (yield-per-seat premium) बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी। अगर डोमेस्टिक ट्रैवल डिमांड कम होती है, तो सरकार द्वारा की गई फ्यूल प्राइसिंग की अस्थायी मदद शेयरधारकों को बड़े नुकसान से बचाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है।
