भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन IndiGo ने सरकार के उस संभावित प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई है जिसमें एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को एयरलाइंस में हिस्सेदारी रखने की छूट मिल सकती है। एयरलाइन का कहना है कि इससे स्लॉट एलोकेशन में भेदभाव का खतरा बढ़ जाएगा।
InterGlobe Aviation, जो IndiGo ब्रांड का संचालन करती है, ने स्पष्ट रूप से उन रेगुलेटरी बदलावों का विरोध किया है जो एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को एयरलाइंस में हिस्सेदारी खरीदने की इजाजत दे सकते हैं। कंपनी का तर्क है कि इससे भारतीय एविएशन सेक्टर में कॉम्पिटिशन का बैलेंस बिगड़ सकता है और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर व एयरलाइन ऑपरेटर के बीच हितों का टकराव पैदा होगा।
क्या है असली खतरा?
इस चिंता के केंद्र में है दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े एयरपोर्ट्स पर कंट्रोल। यहां टेक-ऑफ और लैंडिंग स्लॉट्स की कमी है, और गेट एक्सेस किसी भी एयरलाइन की एफिशिएंसी के लिए बेहद जरूरी है। IndiGo का कहना है कि अगर एक ही एंटिटी एयरपोर्ट और एयरलाइन दोनों को चलाएगी, तो वह अपनी खुद की एयरलाइन को प्राइम स्लॉट्स और बेहतर सुविधाएं देने में प्राथमिकता दे सकती है। इससे स्वतंत्र एयरलाइंस के लिए मैदान असमान हो जाएगा।
एयरलाइन का सुझाव
IndiGo मैनेजमेंट का मानना है कि क्रॉस-ओनरशिप को बढ़ावा देने के बजाय, एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को यात्रियों और एयरलाइंस पर लगने वाले हाई चार्जेस को कम करने पर ध्यान देना चाहिए। कंपनी के मुताबिक, हाई यूजर फीस एयरलाइंस के लिए एक बड़ा खर्च है और इन्हें घटाने से पूरे एविएशन इकोसिस्टम को फायदा होगा।
सरकार का रुख और निवेशकों के लिए संकेत
फिलहाल, नागरिक उड्डयन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) सेक्टर की ग्रोथ बढ़ाने के लिए अलग-अलग पॉलिसी प्रस्तावों का मूल्यांकन कर रहा है। सरकार ने अभी तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा मॉनिटरेबल रिस्क है, क्योंकि स्लॉट एलोकेशन या एयरपोर्ट फीस में कोई भी बदलाव प्रमुख एयरलाइंस की ऑपरेटिंग कॉस्ट और ग्रोथ स्ट्रेटजी को सीधे प्रभावित कर सकता है।
