प्रीमियम में भारी उछाल, रास्ता हुआ बंद?
फारस की खाड़ी क्षेत्र में जहाजों के लिए युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम में जबरदस्त वृद्धि देखी जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार, इसमें 60% तक की बढ़ोतरी हुई है। इस जलडमरूमध्य (Strait) क्षेत्र में प्रीमियम 0.2% से 0.4% तक पहुंच गए हैं, जो पहले लगभग 0.125% थे। इसका मतलब है कि $100 मिलियन के जहाज के लिए प्रति यात्रा बीमा लागत $125,000 से $275,000 तक बढ़ सकती है। इंश्योरेंस कंपनियां अब कोट्स (quotes) सिर्फ 24 घंटे के लिए ही वैध रख रही हैं, जो पहले 48 घंटे थे। लागत में इस वृद्धि और कंपनियों द्वारा कैंसलेशन नोटिस जारी करने से, कमर्शियल ऑपरेटरों, तेल कंपनियों और बीमाकर्ताओं ने हॉरमुज़ जलडमरूमध्य से गुजरना लगभग बंद कर दिया है, जिससे यह तकनीकी रूप से खुला होने के बावजूद एक तरह से बंद हो गया है। इस ठहराव का असर तेल की कीमतों पर भी दिख रहा है, जहां ब्रेंट क्रूड की कीमत $65 प्रति बैरल से बढ़कर $72-73 हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह $100 प्रति बैरल तक भी जा सकती है।
ग्लोबल ट्रेड और ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा असर
हॉरमुज़ जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्ग है, जहां से 20% वैश्विक समुद्री तेल व्यापार होता है। इसके अलावा, यह एलएनजी (LNG) और एलपीजी (LPG) शिपमेंट का भी एक बड़ा हिस्सा संभालता है। इसका बंद होना या बाधित होना कई कमोडिटी (commodity) की सप्लाई चेन को झकझोर सकता है। अनुमान है कि 2025 में वैश्विक समुद्री व्यापार में वृद्धि घटकर सिर्फ 0.5% रह जाएगी, जो 2024 में 2.2% थी। भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ते खर्चों के कारण जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, जिससे परिचालन लागत 6% तक बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, गरीब देशों को इन बढ़ी हुई लागतों और खाद्य असुरक्षा का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
भारत पर विशेष संकट
भारत के लिए हॉरमुज़ जलडमरूमध्य का महत्व बहुत अधिक है। देश अपने कच्चे तेल आयात का लगभग 50%, एलएनजी का 60% और एलपीजी की 80-85% जरूरतों के लिए इसी मार्ग पर निर्भर है। भारत के पास कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार तो है, लेकिन एलपीजी के लिए ऐसा कोई बड़ा भंडार नहीं है, जिससे यह सप्लाई चेन बेहद संवेदनशील हो जाती है। विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि कच्चे तेल की कीमत $10 प्रति बैरल बढ़ती है, तो भारत का सालाना आयात बिल $13-14 बिलियन बढ़ सकता है। यदि तेल $100 प्रति बैरल तक पहुंचा, तो खुदरा महंगाई में 1% की बढ़ोतरी हो सकती है। भारत वैकल्पिक रास्तों और पाइपलाइनों की तलाश कर रहा है, लेकिन ये पूरी तरह से इस बड़ी निर्भरता का समाधान नहीं दे सकते।
ऐतिहासिक संकेत और नए खतरे
अतीत में भी, जैसे ईरान-इराक युद्ध और खाड़ी युद्ध के दौरान, युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम बढ़े थे। हालांकि, तब कार्गो (cargo) का मूल्य बढ़ी हुई बीमा लागत से अधिक होता था, इसलिए शिपिंग में ज्यादा रुकावट नहीं आई। लेकिन वर्तमान स्थिति थोड़ी अलग है। बीमा बाजार अब केवल 'रिस्क-ऑन/रिस्क-ऑफ' के बजाय एक स्थायी रूप से बढ़े हुए आधार स्तर की ओर बढ़ रहा है, जिसमें ड्रोन, मिसाइलों और क्षेत्रीय घटनाओं के कारण कभी भी स्थिति बिगड़ सकती है। यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि कैसे भू-राजनीतिक संघर्ष समुद्री संचालन को बाधित कर सकते हैं।
सप्लाई चेन की नाजुकता
वर्तमान भू-राजनीतिक माहौल वैश्विक सप्लाई चेन की मूलभूत नाजुकता को उजागर करता है। हॉरमुज़ जलडमरूमध्य सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि रसायन और उर्वरक भी ले जाता है, जिसका सीधा असर कृषि और वैश्विक खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। इस एक प्रमुख मार्ग पर जोखिम का केंद्रीकरण बताता है कि किसी भी लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरता से महंगाई बढ़ सकती है, जो यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद देखे गए आर्थिक प्रभाव के समान हो सकती है। भले ही कुछ विश्लेषकों का मानना है कि शुरुआती उछाल के बाद तेल की कीमतें वापस सामान्य हो जाएंगी, बीमाकर्ताओं के पीछे हटने से एक स्थायी 'डी फैक्टो' (de facto) बंद का खतरा एक नया और शक्तिशाली जोखिम है। यह केवल भू-राजनीतिक प्रीमियम का मामला नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर सप्लाई में रुकावट पैदा करेगा, जो कच्चा तेल, उत्पाद, एलपीजी और एलएनजी सभी को प्रभावित करेगा। बीमा बाजार खुद दबाव में है, जिससे प्राथमिक वाहक उच्च शुल्क और सख्त पॉलिसी शब्दों की ओर बढ़ रहे हैं। उच्च युद्ध जोखिम प्रीमियम की लंबी अवधि बीमा लागतों को स्थायी रूप से बढ़ा सकती है, समुद्री व्यापार को प्रभावित कर सकती है और नियमों के बाहर काम करने वाले 'शैडो बेड़े' (shadow fleets) को बढ़ावा दे सकती है।
