हवाई यात्रा करने वालों के लिए राहत के संकेत कम हैं। एयर टर्बाइन फ्यूल की बढ़ती कीमतों और भारतीय रुपये में जारी गिरावट के कारण टिकट के दाम ऊंचे बने रह सकते हैं। निवेशकों के लिए भी यह एक चिंता का विषय है क्योंकि एयरलाइंस के प्रॉफिट मार्जिन पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
बढ़ती लागत का गणित
किसी भी एयरलाइन के कुल ऑपरेटिंग खर्च में एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) का हिस्सा लगभग 30% से 40% होता है। ग्लोबल लेवल पर कच्चे तेल की कीमतों में उठापटक का सीधा असर एयरलाइंस के मुनाफे पर पड़ रहा है। कंपनियां इस बोझ को यात्रियों पर 'फ्यूल सरचार्ज' के जरिए डाल रही हैं, जिससे टिकटें महंगी बनी हुई हैं।\n\nइसके साथ ही, रुपये की कमजोरी ने आग में घी का काम किया है। एयरलाइंस के कई बड़े खर्च, जैसे एयरक्राफ्ट लीज रेंटल, मेंटेनेंस और इंश्योरेंस का भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। डॉलर के मुकाबले रुपये के गिरने से कंपनी के हर ऑपरेशनल खर्च में इजाफा हो गया है।\n\n### सप्लाई चेन और जियोपॉलिटिकल चुनौतियां
वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण कई इंटरनेशनल फ्लाइट्स के रूट बदल दिए गए हैं। लंबे रूट का मतलब है अधिक फ्यूल की खपत और ज्यादा खर्च। साथ ही, मार्केट में सीटों की सप्लाई भी सीमित है। डिमांड के मुकाबले सप्लाई कम होने के कारण कीमतों में नरमी के संकेत नहीं दिख रहे हैं।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
इन्वेस्टर्स के लिए यह दौर जोखिम और अवसर का मिश्रण है। भारत में हवाई यात्रियों की डिमांड तो मजबूत है, लेकिन एयरलाइंस के मार्जिन पर एक्सटर्नल फैक्टर्स का भारी दबाव है। DGCA पहले ही साफ कर चुका है कि हवाई किराया मार्केट-ड्रिवन है, यानी सरकार की तरफ से कीमतों पर कैपिंग की उम्मीद नहीं है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि एयरलाइंस किस तरह इन चुनौतियों के बीच अपने ऑपरेशनल खर्च को मैनेज करती हैं।
