सड़क परिवहन मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने के लिए **630 किलोमीटर** लंबे हाईवे कॉरिडोर का ऐलान किया है। इस प्रोजेक्ट का मकसद लॉजिस्टिक्स को आसान बनाना है, लेकिन निवेशकों के लिए चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों के कारण एग्जीक्यूशन टाइमलाइन पर नजर रखना जरूरी होगा।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत के बीच कनेक्टिविटी को रफ्तार देने के लिए एक बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान तैयार किया है। ₹61,500 करोड़ की लागत वाले इस 630 किलोमीटर लंबे हाईवे कॉरिडोर से सिलीगुड़ी, गुवाहाटी और शिलांग के बीच यात्रा और माल ढुलाई में आने वाली अड़चनें दूर होंगी।
प्रोजेक्ट की बड़ी बातें
इस योजना के तहत कई चरणों में काम होगा। सिलीगुड़ी और गुवाहाटी के बीच 400 किलोमीटर के हिस्से पर ₹30,000 करोड़ खर्च किए जाएंगे। इसके अलावा जोरबत और बरापानी के बीच एक ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट भी शामिल है, जिससे सफर की दूरी 100 किमी से घटकर 66 किमी रह जाएगी। उम्मीद है कि यात्रा का समय 150 मिनट से गिरकर मात्र 60 मिनट हो जाएगा। साथ ही, शिलांग और सिलचर के बीच 165 किलोमीटर लंबे लिंक पर काम शुरू होने की तैयारी है, जिसके वर्क ऑर्डर नवंबर तक जारी किए जा सकते हैं।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
इंफ्रा और EPC सेक्टर की कंपनियों के लिए यह बड़े ऑर्डर्स का जरिया बन सकता है। हालांकि, पूर्वोत्तर की कठिन पहाड़ी भौगोलिक स्थिति और जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। देरी की स्थिति में प्रोजेक्ट की लागत बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर निर्माण कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर देखने को मिल सकता है।
अकेले असम में सरकार ₹2 लाख करोड़ की लागत से 4,700 किलोमीटर के प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। इसके अतिरिक्त ₹92,000 करोड़ के 31 नए प्रोजेक्ट्स भी पाइपलाइन में हैं।
निवेश का नजरिया
बाजार के जानकारों के मुताबिक, निवेशकों को अब इन प्रोजेक्ट्स में 'लैंड एक्विजिशन' की रफ्तार और वर्क ऑर्डर मिलने के टाइमलाइन पर कड़ी नजर रखनी चाहिए। ज्यादातर प्रोजेक्ट्स हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (HAM) या सरकारी अनुदान पर आधारित होते हैं, इसलिए कंपनियों के कैश फ्लो पर इन नई घोषणाओं का असर देखना अहम होगा।
