एविएशन मिनिस्ट्री एक बड़े पॉलिसी बदलाव पर विचार कर रही है। इस बदलाव के तहत, Adani Group और GMR Airports जैसे एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को अपनी एयरलाइन्स शुरू करने की इजाज़त मिल सकती है। इसका मकसद इंडिगो (IndiGo) और एयर इंडिया (Air India) के दबदबे को तोड़ना है, जो अभी डोमेस्टिक फ्लाइट कैपेसिटी का लगभग **90%** कंट्रोल करते हैं।
Detailed Coverage
एविएशन सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी
नागरिक उड्डयन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) एक ऐसे रेगुलेटरी बदलाव पर चर्चा कर रहा है जिससे एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को अपनी एयरलाइन्स चलाने और उन्हें मैनेज करने की अनुमति मिल सकती है। मौजूदा नियमों के तहत, एयरपोर्ट ऑपरेटर्स किसी भी एयरलाइन में केवल 10% हिस्सेदारी रख सकते हैं ताकि निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनी रहे। इस लिमिट को हटाकर सरकार एयरलाइन्स के बीच पावर कंसंट्रेशन को कम करना चाहती है।
बढ़ेगा मार्केट में कॉम्पिटिशन?
अगर यह पॉलिसी मंजूर हो जाती है, तो Adani Group और GMR Airports जैसी बड़ी कंपनियां सिर्फ एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर मैनेज करने से आगे बढ़कर फ्लाइट ऑपरेशन में भी कदम रख सकती हैं। Adani Group मुंबई सहित कई बड़े एयरपोर्ट्स को मैनेज करती है, जबकि GMR Airports दिल्ली जैसे हाई-ट्रैफिक हब्स को हैंडल करती है। एविएशन सेक्टर में कॉम्पिटिशन हाल के दिनों में कम हुआ है, खासकर Jet Airways और Go First जैसी एयरलाइन्स के बंद होने और Vistara व AirAsia India के Air India ब्रांड में मर्ज होने के बाद। सरकार इस कंसंट्रेशन से पैसेंजर सर्विसेज पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित है।
क्या हैं चुनौतियाँ?
इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में कुछ बड़ी चुनौतियाँ भी हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे हितों का टकराव (conflict of interest) हो सकता है। अगर कोई एयरपोर्ट ऑपरेटर अपनी एयरलाइन चलाता है, तो इस बात का खतरा है कि वह अपनी फ्लाइट्स को बेहतर लैंडिंग स्लॉट या ज्यादा सुविधाजनक गेट लोकेशन दे सकता है, जिससे दूसरी एयरलाइन्स को नुकसान हो सकता है। ऐसे में, एयरपोर्ट्स इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी (AERA) और अन्य रेगुलेटर्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी एयरलाइन्स के साथ निष्पक्ष व्यवहार हो।
इसके अलावा, एक नई एयरलाइन शुरू करना एक बहुत बड़ा और कैपिटल-इंटेंसिव काम है। रेगुलेटरी रुकावटें हटने के बावजूद, ग्लोबल एविएशन इंडस्ट्री में एयरबस (Airbus) और बोइंग (Boeing) जैसे मैन्युफैक्चरर्स की सप्लाई चेन प्रॉब्लम्स के कारण एयरक्राफ्ट की कमी बनी हुई है। इसका मतलब है कि सरकारी मंजूरी मिलने के बाद भी, नई एयरलाइन्स को अपना बेड़ा (fleet) बनाने और एक कॉम्पिटिटिव नेटवर्क स्थापित करने में काफी समय और पैसा लगेगा।
एविएशन सेक्टर का फ्यूचर
सरकार 2047 तक देश में 350 ऑपरेशनल एयरपोर्ट्स बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) का अनुमान है कि 2044 तक डोमेस्टिक पैसेंजर 42.5 करोड़ तक पहुंच जाएंगे। ऐसे में, अधिकारी यह सुनिश्चित करने के तरीकों की तलाश कर रहे हैं कि मार्केट इस ग्रोथ को सपोर्ट कर सके। इस प्रस्ताव के अगले चरणों में लॉ मिनिस्ट्री से लीगल रिव्यू और फिर यूनियन कैबिनेट से फाइनल अप्रूवल शामिल है। निवेशकों को इस पॉलिसी पर आगे की सरकारी सूचनाओं या कंसल्टेशन पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि कोई भी बदलाव एयरपोर्ट ऑपरेटर्स की लॉन्ग-टर्म बिजनेस स्ट्रेटेजी और मौजूदा एयरलाइन्स के कॉस्ट स्ट्रक्चर को प्रभावित कर सकता है।
