केंद्र सरकार ने वाराणसी में ट्रैफिक जाम से निपटने के लिए दो बड़े एलिवेटेड कॉरिडोर प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है। कुल 89 किलोमीटर लंबे इन प्रोजेक्ट पर **₹25,446 करोड़** खर्च होंगे। NHAI इन्हें हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल के तहत बनाएगा, जिससे पूर्वी उत्तर प्रदेश में लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी में सुधार होगा।
प्रोजेक्ट का दायरा और फाइनेंसिंग
केंद्रीय कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति ने वाराणसी में दो हाई-स्पीड एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने की मंजूरी दी है। यह प्रोजेक्ट शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिस पर कुल ₹25,445.96 करोड़ का निवेश किया जाएगा। करीब 89 किलोमीटर लंबी एक्सेस-कंट्रोल्ड सड़कों का निर्माण किया जाएगा ताकि शहर की पुरानी ट्रैफिक समस्याओं का समाधान हो सके।
पहले कॉरिडोर का विस्तार 46.039 किलोमीटर होगा, जो गंगा नदी के किनारे नेशनल हाईवे-19 को वाराणसी रिंग रोड से जोड़ेगा। इस पर अनुमानित ₹14,447.64 करोड़ खर्च होंगे। दूसरा कॉरिडोर 43.218 किलोमीटर लंबा होगा और यह वरुण नदी के किनारे नेशनल हाईवे-31 को वाराणसी रिंग रोड से जोड़ेगा, जिसकी लागत ₹10,998.32 करोड़ होगी। दोनों प्रोजेक्ट्स का काम नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (Hybrid Annuity Model) के तहत करेगी। इस मॉडल में, सरकार निर्माण के दौरान लागत का कुछ हिस्सा वहन करती है, जबकि बाकी का फंड और रखरखाव प्राइवेट डेवलपर संभालता है।
कनेक्टिविटी और स्पीड का लक्ष्य
इन एलिवेटेड कॉरिडोर पर 80 से 100 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से गाड़ियां चल सकेंगी। अनुमान है कि इससे नेशनल हाईवे-19 और काशी रेलवे स्टेशन के बीच यात्रा का समय आधा से भी कम हो जाएगा। यह प्रोजेक्ट लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट, विभिन्न रेलवे स्टेशनों और रामनगर इनलैंड वॉटरवेज पोर्ट तक सीधी पहुँच प्रदान करेगा, जिससे पूर्वी उत्तर प्रदेश में सामानों की आवाजाही को गति मिलेगी। खास बात यह है कि गंगा नदी पर एक केबल-स्टेड ब्रिज (cable-stayed bridge) और काशी विश्वनाथ मंदिर के पास पैदल चलने वालों के लिए अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर भी बनाया जाएगा, ताकि आधुनिकता के साथ शहर की विरासत का भी ध्यान रखा जा सके।
निवेशकों के लिए क्या है खास
इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन सेक्टर के निवेशकों के लिए यह मंजूरी PM गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान के तहत भविष्य के प्रोजेक्ट्स का एक स्पष्ट संकेत है। हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल के इस्तेमाल से कंस्ट्रक्शन कंपनियों के लिए वित्तीय जोखिम संतुलित रहता है, क्योंकि सरकार निर्माण लागत का एक हिस्सा उठाती है। हालांकि, इन प्रोजेक्ट्स की सफलता ठेकेदारों द्वारा जमीन अधिग्रहण, समय-सीमा का पालन और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच लागत नियंत्रण पर निर्भर करेगी। निवेशकों को भविष्य में होने वाली टेंडरिंग और ठेकेदार के चयन पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इन बड़े प्रोजेक्ट्स का असर आने वाले वर्षों में सड़क निर्माण से जुड़ी बड़ी कंपनियों के ऑर्डर बुक और वर्किंग कैपिटल पर पड़ेगा।
