Union Cabinet ने देश में ही शिपिंग कंटेनर बनाने के लिए **₹10,000 करोड़** के एक बड़े प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। इस कदम का मकसद आयात पर निर्भरता कम करना और एक्सपोर्टर्स को ग्लोबल संकट से बचाना है।
घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पर जोर
Union Cabinet ने आधिकारिक तौर पर ₹10,000 करोड़ के इस इनिशिएटिव को हरी झंडी दे दी है। यह पॉलिसी, जिसे पहली बार 2026/27 के बजट में प्रस्तावित किया गया था, अब जमीनी स्तर पर लागू होने जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य कंटेनर उत्पादन के लिए घरेलू क्षमता का निर्माण करना है, ताकि ग्लोबल मार्केट में बढ़ती कीमतों और सप्लाई की दिक्कतों से बचा जा सके।
एक्सपोर्टर्स को मिलेगी मजबूती
अब तक भारत अपनी जरूरत के लिए विदेशी मैन्युफैक्चरर्स, खास तौर पर चीन पर निर्भर रहा है। इस नए एलोकेशन से लॉजिस्टिक्स सेक्टर में एक मजबूत सप्लाई चेन तैयार होगी। निवेशकों के लिए यह उन इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए बड़ा अवसर हो सकता है, जो आने वाले समय में अपना विस्तार कंटेनर फैब्रिकेशन की ओर कर सकती हैं। विश्वसनीय कंटेनर एक्सेस मिलने से एक्सपोर्टर्स की लागत भी कम होगी।
ग्लोबल चुनौतियों का सामना
जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण ग्लोबल मैरीटाइम ट्रेड काफी दबाव में है। लंबे और महंगे रूटों की वजह से कंटेनर कई बार समुद्र में ही फंसे रह जाते हैं, जिससे पोर्ट्स पर इनकी भारी किल्लत हो जाती है। ऐसे में यह घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पुश एक डिफेंसिव स्ट्रैटेजी की तरह काम करेगा।
हालांकि, इस सफलता के लिए केवल सरकारी फंडिंग काफी नहीं होगी। कंटेनर बनाने के लिए खास ग्रेड के स्टील और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों की जरूरत होती है। ग्लोबल मार्केट में पहले से जमे बड़े खिलाड़ियों की तुलना में भारतीय कंपनियों को तेजी से कॉम्पिटिटिव बनना होगा। आने वाले समय में टेंडर प्रोसेस और मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी की शुरुआत पर निवेशकों की नजरें टिकी रहेंगी।
