Gig Workers की कमाई घटी: पेट्रोल के दाम बढ़े, प्लेटफॉर्म की बदली रणनीति

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AuthorAditya Rao|Published at:
Gig Workers की कमाई घटी: पेट्रोल के दाम बढ़े, प्लेटफॉर्म की बदली रणनीति
Overview

क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के डिलीवरी वर्कर्स की कमाई में गिरावट आई है। बढ़ते पेट्रोल के दाम और कम इंसेंटिव्स (incentives) उनकी कमाई पर असर डाल रहे हैं, भले ही गिग वर्कर्स की डिमांड अभी भी बनी हुई है। अब प्लेटफॉर्म्स आक्रामक विस्तार की जगह मुनाफा कमाने पर ध्यान दे रहे हैं।

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गिग वर्कर्स की जेब पर मार

पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों के चलते गिग वर्कर्स (Gig Workers) की कमाई पर भारी असर पड़ रहा है। कई वर्कर्स, जो हर दिन करीब 100 किलोमीटर तक गाड़ी चलाते हैं, उनका कहना है कि उन्हें मिलने वाली पेमेंट खर्च निकालने के लिए काफी नहीं है। यह दबाव ऐसे समय में आया है जब क्विक-कॉमर्स कंपनियां आक्रामक विस्तार और भारी भरकम इंसेंटिव्स (incentives) बांटने के मॉडल से हटकर, मुनाफे पर आधारित टिकाऊ रणनीति अपना रही हैं।

मुनाफे की ओर बढ़ता फोकस

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब प्लेटफॉर्म्स राइडर्स की सप्लाई बढ़ाने के बजाय मुनाफे और IPO के लिए तैयारी पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। टीमलीज सर्विसेज (TeamLease Services) के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बालासुब्रमण्यन ए. ने कहा, "प्लेटफॉर्म्स अब कंसॉलिडेशन फेज (consolidation phase) में हैं। पहले वे समस्या पर पैसा फेंक रहे थे, लेकिन अब फोकस प्रॉफिटेबिलिटी, IPO रेडीनेस और यूटिलाइजेशन (utilisation) को बेहतर बनाने पर है।"

मांग प्रबंधन में बदलाव

कंपनियां खासकर दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक के पीक आवर्स (peak hours) में डिलीवरी मांग को मैनेज करने के तरीके बदल रही हैं। ज्यादा से ज्यादा ऑर्डर कराने के बजाय, ऐप्स कुछ इलाकों में न्यूनतम वर्कर्स को एक्टिव रखकर उन्हें अत्यधिक गर्मी से बचा रहे हैं। एल्गोरिदम (algorithms) में भी बदलाव किए जा रहे हैं ताकि उन वर्कर्स को प्राथमिकता मिले जिन्होंने अभी तक डिलीवरी पूरी नहीं की है, वहीं एक ही ट्रिप में कई ऑर्डर्स को 'बकेट' (bucketing) करने जैसे तरीकों को कम किया जा रहा है।

इंसेंटिव स्ट्रक्चर में बदलाव

हालांकि बेस पे रेट (base pay rates) तो समान हैं, लेकिन कुल कमाई इंसेंटिव्स, माइलस्टोन (milestones) और टाइम स्लॉट (time slots) के आधार पर बदलती है। एक बड़ा बदलाव यह है कि अब दिन के इंसेंटिव्स की जगह देर शाम और रात के इंसेंटिव्स पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। इस ऑपरेशनल एडजस्टमेंट (operational adjustment) का मकसद वर्कर्स की उपलब्धता को मैनेज करना है, जो अभी भी प्लेटफॉर्म्स के लिए एक चुनौती बनी हुई है, बिना पे-आउट (payout) में बड़ी बढ़ोतरी किए। गिग वर्क की स्थानीय प्रकृति का मतलब है कि एक ही शहर के अलग-अलग इलाकों में भी वर्कर्स की उपलब्धता अलग-अलग हो सकती है।

परिचालन बाधाओं के बीच ग्रोथ

उपभोक्ता खर्च में बढ़ोतरी और नॉन-ग्रोसरी (non-grocery) कैटेगरी में विस्तार के कारण क्विक-कॉमर्स की ग्रोथ मजबूत बनी हुई है। हालांकि, यह ग्रोथ अब सीधे तौर पर वर्कफोर्स (workforce) के अनुपात में विस्तार में तब्दील नहीं हो रही है। कंपनियां वेयरहाउस ऑप्टिमाइजेशन (warehouse optimization) की चुनौतियों का भी सामना कर रही हैं क्योंकि प्रोडक्ट वैरायटी (product variety) बढ़ रही है, जिससे इन्वेंट्री मैनेजमेंट (inventory management) जटिल हो रहा है। इन मुद्दों के बावजूद, ऐप-आधारित गिग वर्क की तुलना में कंस्ट्रक्शन (construction) और इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) जैसे सेक्टर में लेबर शॉर्टेज (labor shortage) ज्यादा है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.