मिडिल ईस्ट टेंशन का सीधा असर
मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक अस्थिरता का असर अब भारतीय एयरलाइंस पर साफ दिखने लगा है। ईरान पर हुए हमलों के बाद इस क्षेत्र में पैदा हुई तनातनी के चलते कई देशों ने अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है। इसका सीधा नतीजा यह हुआ है कि IndiGo और SpiceJet जैसी भारतीय एयरलाइंस को UAE जाने वाली फ्लाइट्स को या तो रद्द करना पड़ा है या उन्हें दूसरे लंबे रूट से उड़ाना पड़ रहा है।
फ्लाइट्स पर बढ़ा खर्च
इन बदले हुए रूटों की वजह से एयरलाइंस के ऑपरेशनल खर्चों में भारी बढ़ोतरी हो रही है। सबसे बड़ा झटका ईंधन (Fuel) पर लग रहा है, जो पहले से ही एयरलाइन के बजट का 30% से 40% तक होता है। लंबी उड़ानें और ज्यादा ईंधन की खपत से लागत और बढ़ जाती है। IndiGo, जिसका पी/ई रेश्यो (P/E Ratio) 44.1 है, के मुनाफे पर दबाव आ रहा है, वहीं SpiceJet, जिसका पी/ई रेश्यो -1.90 है, पहले से ही मुश्किलों में है और यह स्थिति और गंभीर हो सकती है।
सेक्टर के लिए चिंताजनक हालात
ICRA की रिपोर्ट के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY2026) में भारतीय एविएशन सेक्टर को ₹170-180 बिलियन का नेट लॉस होने का अनुमान है। ऐसे भू-राजनीतिक झटके इस अनुमान को और खराब कर सकते हैं। पहले भी ऐसे संकटों के कारण एयरलाइंस के शेयरों में बड़ी गिरावट आई है और यात्रियों का भरोसा डगमगाया है। IndiGo, जिसकी मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) करीब ₹1.86 ट्रिलियन है, पर भी इन बढ़ी हुई लागतों का असर पड़ रहा है। वहीं, SpiceJet की माली हालत बेहद नाजुक है, जिसका बुक वैल्यू प्रति शेयर -₹2.92 है। टाटा ग्रुप के अधीन एयर इंडिया एक्सप्रेस (Air India Express) ने भी FY25 में ₹5,678.2 करोड़ का भारी घाटा दर्ज किया है।
SpiceJet पर सबसे ज्यादा खतरा
SpiceJet का डेट-टू-इक्विटी रेश्यो (Debt-to-Equity Ratio) 1.60 है और उसकी रेवेन्यू ग्रोथ (Revenue Growth) कमजोर है। ऐसे में, लंबे समय तक चलने वाले परिचालन संबंधी व्यवधानों के प्रति यह कंपनी सबसे ज्यादा संवेदनशील है। लगातार नकारात्मक पी/ई रेश्यो (P/E Ratio) -1.90 बताता है कि कंपनी लगातार मुनाफे से जूझ रही है। यह भू-राजनीतिक घटना कंपनी की रिकवरी को और पटरी से उतार सकती है।
आगे क्या?
ICRA ने भारतीय एविएशन सेक्टर के लिए 'स्टेबल' आउटलुक बनाए रखा है, लेकिन चेतावनी दी है कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव और परिचालन संबंधी बाधाएं सेक्टर की ग्रोथ के अनुमानों के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर सकती हैं। अगर मध्य पूर्व के हवाई गलियारों में लंबे समय तक रुकावट बनी रहती है, तो एयरलाइंस के ऑपरेशनल कॉस्ट में स्थायी बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे आने वाली तिमाहियों में सर्विस लेवल और मुनाफे को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। इसके अलावा, डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से एयरलाइंस पर डॉलर में होने वाले खर्चों का बोझ और बढ़ जाता है।