केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स की प्लानिंग और क्वालिटी में बड़े बदलाव के निर्देश दिए हैं। अब टेंडर मिलने की प्रक्रिया और सख्त होगी, जिसका असर सीधे तौर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की कंपनियों पर पड़ेगा।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने गुजरात में आयोजित 'चिंतन शिविर 2026' के दौरान हाईवे निर्माण की कार्यप्रणाली में आमूल-चूल बदलाव का संकेत दिया है। सरकार का मुख्य फोकस अब Detailed Project Report (DPR) की सटीकता पर है ताकि बजट में बार-बार होने वाली बढ़ोतरी और देरी जैसी समस्याओं से बचा जा सके।
निवेशकों के लिए क्या है नया?
अब सरकार ठेकेदारों और कंसल्टेंट्स के लिए 'परफॉर्मेंस-बेस्ड अकाउंटेबिलिटी' मॉडल लागू करने जा रही है। इसका मतलब यह है कि किसी कंपनी को भविष्य में नया सरकारी टेंडर मिलेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उसने पुराने प्रोजेक्ट्स को कितनी कुशलता से पूरा किया है। अगर कंपनी की पुरानी DPR रिपोर्टें गलत पाई गईं या काम में देरी हुई, तो उनके लिए नए बिड्स (Bids) जीतना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सेक्टर पर रिस्क और असर
यह नीति निर्माण क्षेत्र के लिए मिली-जुली खबर है। जहां एक ओर क्वालिटी बढ़ने से प्रोजेक्ट की लॉन्ग-टर्म वायबिलिटी बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर कंपनियों पर 'कॉम्प्लायंस कॉस्ट' का बोझ बढ़ सकता है। एडवांस्ड सर्वे और टेक्निकल प्लानिंग के लिए अब ज्यादा खर्च करना पड़ेगा, जिससे शॉर्ट-टर्म में मार्जिन (Margin) पर दबाव देखने को मिल सकता है।
आगे क्या होगा?
इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के शेयरधारकों को अब आने वाले टेंडर्स की शर्तों पर पैनी नजर रखनी चाहिए। सरकार का संकेत साफ है—अब सस्ते दांव लगाकर बिड जीतने का दौर खत्म हो सकता है। आने वाले समय में टेंडर की शर्तें क्वालिटी और परफॉर्मेंस ऑडिट से जुड़ी होंगी, जो यह तय करेंगी कि कौन सी कंपनियां मार्केट में टिकी रहेंगी और किनके लिए आगे राह मुश्किल हो सकती है।
