Electric Trucks: डीजल की बढ़ती कीमतों से चमकी ई-ट्रक की किस्मत, कंपनियों को होगा बंपर फायदा

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AuthorAditya Rao|Published at:
Electric Trucks: डीजल की बढ़ती कीमतों से चमकी ई-ट्रक की किस्मत, कंपनियों को होगा बंपर फायदा

यूरोप के 6 बड़े बाजारों में डीजल की कीमतों में उछाल के चलते इलेक्ट्रिक ट्रकों का संचालन अब डीजल ट्रकों से सस्ता हो गया है। फ्लीट ऑपरेटर्स अपनी बढ़ी हुई लागत को महज **2 साल** में वसूल कर सकेंगे, हालांकि चीन के सस्ते ट्रकों से यूरोपीय कंपनियों को कड़ी टक्कर मिल रही है।

आर्थिक समीकरण में आया बड़ा बदलाव

यूरोप में भारी-भरकम इलेक्ट्रिक ट्रकों ने एक नया फाइनेंशियल टर्निंग पॉइंट हासिल कर लिया है। 'Transport & Environment' की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी, नीदरलैंड, डेनमार्क, स्वीडन, फ्रांस और बेल्जियम में इलेक्ट्रिक ट्रकों की टोटल ओनरशिप कॉस्ट अब डीजल ट्रकों से काफी कम हो गई है। ये 6 देश यूरोपियन यूनियन में कुल ट्रक रजिस्ट्रेशन का करीब 46% हिस्सा रखते हैं।

क्यों इलेक्ट्रिक ट्रक हैं बेहतर विकल्प?

इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण ईंधन की कीमतों में अस्थिरता है। जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण डीजल के दाम तेजी से बदल रहे हैं, जिससे बचने के लिए कंपनियां ई-ट्रकों की ओर रुख कर रही हैं। नीदरलैंड्स में ऑपरेटर्स 5 साल की अवधि में €100,000 तक की बचत कर सकते हैं, जबकि जर्मनी में यह आंकड़ा €85,000 के करीब है। हालांकि इन ट्रकों की शुरुआती कीमत अधिक है, लेकिन ऑपरेशनल बचत इतनी है कि मालिक 24 महीने के भीतर अपना एक्स्ट्रा खर्च वसूल कर रहे हैं।

चीनी कंपनियों से मिली चुनौती

इस दौड़ में Daimler Truck, Volvo Group और Scania जैसी दिग्गज यूरोपीय कंपनियां दबाव में हैं। चीन में बने इलेक्ट्रिक ट्रक यूरोपीय बाजार में €210,000 की कीमत पर मिल रहे हैं, जबकि यूरोपीय मॉडल्स की कीमत €265,000 के आसपास है। जर्मनी में चीनी ई-ट्रक चुनने पर 5 साल में अतिरिक्त €34,000 की बचत हो सकती है, जो घरेलू निर्माताओं के लिए खतरे की घंटी है।

निवेशकों के लिए संकेत

यह ट्रेंड भारत जैसे बाजारों के लिए भी एक आईना है, जहां Tata Motors और Ashok Leyland जैसी कंपनियां अपने इलेक्ट्रिक पोर्टफोलियो का विस्तार कर रही हैं। भविष्य में बैटरी की गिरती कीमतें और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की ग्रोथ यह तय करेगी कि क्या भारत में भी ऐसे ही समीकरण बनते हैं। फिलहाल निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि यूरोपीय दिग्गज कंपनियां इस प्राइस गैप को कैसे कम करती हैं और चीन से आने वाले आयात पर क्या ट्रेड पॉलिसी अपनाई जाती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.