इलेक्ट्रिक ट्रकों-बसों के लिए मिला बड़ा बूस्ट
Drivn, जो भारत के इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर में काम कर रही है, ने $140 मिलियन का भारी-भरकम फंड जुटा लिया है। इस फंडिंग में जापान की Nomura का $80 मिलियन का बड़ा योगदान शामिल है, जिसे आंशिक रूप से डेट (debt) और इक्विटी (equity) के मिश्रण के तौर पर देखा जा रहा है। Drivn खास तौर पर भारत के हैवी कमर्शियल इलेक्ट्रिक व्हीकल मार्केट पर फोकस कर रही है, जिसमें बसें और ट्रक शामिल हैं। यह सेक्टर एंट्री के लिए बेहद महंगा है और लागत व ऑपरेशनल मुश्किलों के चलते इसमें धीमी रफ्तार देखी जा रही है। पारंपरिक लेंडर्स (lenders) भी इन भारी-भरकम वाहनों के लिए पैसा देने से हिचकिचाते रहे हैं, क्योंकि इनमें भारी पूंजी निवेश और एसेट्स (assets) से जुड़े रिस्क होते हैं।
Drivn का 'खरीदो, लीज पर दो, चार्ज करो' वाला दांव
NITI Aayog की पूर्व अधिकारी Alpna Jain और Manav Bansal द्वारा स्थापित, Drivn की रणनीति कमर्शियल फ्लीट्स (fleets) को इलेक्ट्रिफाई (electrify) करने की वित्तीय चुनौतियों को दूर करने के लिए बनाई गई है। कंपनी इलेक्ट्रिक बसें और ट्रक खरीदकर उन्हें ऑपरेटर्स को लॉन्ग-टर्म एग्रीमेंट्स (long-term agreements) के तहत लीज पर देगी। यह सीधे तौर पर मुख्य बाधा को दूर करता है: इलेक्ट्रिक वाहन डीजल वाहनों की तुलना में शुरुआत में बहुत महंगे होते हैं। उदाहरण के लिए, एक इलेक्ट्रिक बस की कीमत डीजल बस से 2 से 2.5 गुना ज्यादा हो सकती है, जिसकी कीमत ₹1.5 करोड़ से ₹2.2 करोड़ प्रति यूनिट तक जा सकती है। Drivn इलेक्ट्रिक पॉवरट्रेन (powertrain) से होने वाली बचत पर जोर देती है, जिसका अनुमानित रनिंग कॉस्ट (running cost) ₹35 प्रति किलोमीटर तक कम हो सकता है, जबकि डीजल का यह खर्च लगभग ₹50 प्रति किलोमीटर आता है। यह बचत, जो प्रति बस सालाना करीब ₹30 लाख हो सकती है, और 25 साल में कम कुल लागत (overall cost of ownership), इसके फाइनेंसिंग मॉडल के लिए महत्वपूर्ण हैं। Drivn पब्लिक चार्जिंग नेटवर्क्स पर निर्भर रहने के बजाय, अपने डिपो (depots) और व्यस्त फ्रेट रूट्स (freight routes) पर खुद के चार्जिंग स्टेशन बनाने की योजना बना रही है।
कौन है मुकाबला?
Drivn भारत के तेजी से बढ़ते कमर्शियल इलेक्ट्रिक व्हीकल मार्केट में कदम रख रही है, जहां पहले से ही Tata Motors और Ashok Leyland जैसी बड़ी ऑटो कंपनियां अपनी इलेक्ट्रिक पेशकशों का तेजी से विस्तार कर रही हैं। Tata Motors ने अपने Prima E.55S इलेक्ट्रिक ट्रक पेश किए हैं और FY2025 तक 3,300 इलेक्ट्रिक बसें उतारने की योजना है। वहीं, Ashok Leyland भी अपनी EV यूनिट, Switch Mobility, में भारी निवेश कर रही है। Mahindra & Mahindra, Eicher Motors, और Olectra Greentech जैसी कंपनियां भी इस स्पेस में सक्रिय हैं। 2025 तक, भारत के EV सेक्टर में कुल फंडिंग सालाना 27% बढ़कर $1.4 बिलियन हो गई है, जिसमें कमर्शियल EV प्रोजेक्ट्स को पैसेंजर EV स्टार्टअप्स से ज्यादा पूंजी मिली है। Drivn का लक्ष्य एक इंडिपेंडेंट एग्रीगेटर (aggregator) बनना है, जो Ashok Leyland, Tata Motors, JBM, और Volvo-Eicher जैसे विभिन्न निर्माताओं से वाहन खरीदेगी।
चुनौतियां और जोखिम
भारी फंडिंग के बावजूद, Drivn की योजनाओं के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी समस्या हैवी कमर्शियल इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए अविकसित चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) की है। Drivn रूट-स्पेसिफिक चार्जिंग पर निर्भर रहेगी, लेकिन लॉन्ग-हॉल (long-haul) ट्रकों और बसों के लिए हाई-कैपेसिटी चार्जिंग स्टेशनों की सामान्य कमी ऑपरेशनल रिस्क पैदा करती है। इसके अलावा, इन नए वाहनों के लॉन्ग-टर्म रीसेल वैल्यू (resale value) और मेंटेनेंस (maintenance) का अभी पूरी तरह से पता नहीं चला है। भारत का पावर ग्रिड, भले ही सुधर रहा हो, अभी भी फॉसिल फ्यूल्स (fossil fuels) पर काफी निर्भर है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों के पर्यावरणीय फायदे को कम करता है। Drivn का फाइनेंसिंग मॉडल, जो डेट पर आधारित है और अनुमानित बचत पर टिका है, अगर फ्लीट का उपयोग उम्मीद से कम रहता है या ऑपरेशनल दिक्कतें आती हैं, तो मुश्किल में पड़ सकता है।
सरकारी समर्थन और भविष्य की योजना
भारत सरकार EV को बढ़ावा देने के लिए FAME II और PM E-DRIVE जैसी योजनाओं के माध्यम से वित्तीय प्रोत्साहन और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए मदद दे रही है। सरकार ने 2030 तक 30% EV अपनाने और वाहनों के बेड़े को इलेक्ट्रिफाई करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखे हैं। Drivn के फाउंडर्स का मानना है कि पारंपरिक बैंक इस सेक्टर में अधिक सक्रिय होने से पहले उनके पास 5-7 साल का एक रणनीतिक अवसर है। कंपनी FY27 तक ₹1,200 करोड़ से अधिक के वाहनों का एसेट बेस (asset base) बनाने और ₹1,340 करोड़ का एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है।
