Delhi Metro: 'आखिरी मील' कनेक्टिविटी का झोल, मोबिलिटी टेक क्यों है ज़रूरी

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AuthorNeha Patil|Published at:
Delhi Metro: 'आखिरी मील' कनेक्टिविटी का झोल, मोबिलिटी टेक क्यों है ज़रूरी

हर दिन 60 लाख से ज़्यादा यात्रियों को वक्त पर पहुंचाने वाली दिल्ली मेट्रो के सामने 'आखिरी मील' कनेक्टिविटी की एक बड़ी चुनौती खड़ी है। यात्री अपने सफ़र का लगभग आधा समय और खर्च इसी आखिरी हिस्से पर करते हैं, जो शहरी ट्रांसपोर्ट में एक बड़ी बाधा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के मौक़े को दिखाता है।

दिल्ली मेट्रो की 'आखिरी मील' की कहानी

दिल्ली मेट्रो को भारत में मास अर्बन ट्रांसपोर्ट की एक बड़ी सफलता माना जाता है। यह 99.95% तक समय की पाबंदी के साथ रोज़ाना लगभग 64 लाख यात्रियों को 416.5 किमी लंबे नेटवर्क पर सेवा देती है। लेकिन, एक बड़ी दिक्कत है - 'आखिरी मील' कनेक्टिविटी का गैप। वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) इंडिया की एक ताज़ा स्टडी बताती है कि यात्रियों को अपने फाइनल डेस्टिनेशन तक पहुँचने के लिए मेट्रो स्टेशन से या तो कहीं जाना होता है या स्टेशन तक आना होता है, जिसमें उनका कुल यात्रा समय का लगभग 40% और सफ़र के खर्च का 48% लग जाता है। यह पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर एक तरह का 'एक्सेसिबिलिटी टैक्स' बन गया है।

आर्थिक और सुरक्षा पर असर

इन्वेस्टर्स और शहरी योजनाकारों के लिए, यह गैप सिर्फ यात्रियों की परेशानी से कहीं ज़्यादा है। यह पहले से बने महंगे और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के पूरी तरह इस्तेमाल होने में रुकावट पैदा करता है। जब सफ़र का आखिरी हिस्सा महंगा, टाइम-कंज्यूमिंग या असुरक्षित लगता है, तो लोग अक्सर अपनी प्राइवेट गाड़ियों का रुख करते हैं। इससे शहर में ट्रैफिक जाम और प्रदूषण बढ़ता है, जो मेट्रो सिस्टम के फायदों को कम करता है। यह समस्या खासकर महिलाओं के लिए गंभीर है, जो इस आखिरी हिस्से के लिए सफ़र के साधनों का चुनाव करते समय पर्सनल सेफ्टी को सबसे बड़ा कारण बताती हैं।

मोबिलिटी में नए अवसर

जैसे-जैसे सरकार क्लीनर ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है, इस गैप को भरने के लिए प्राइवेट मोबिलिटी प्रोवाइडर्स पर ध्यान दिया जा रहा है। प्राइवेट कंपनियाँ इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के ज़रिए भरोसेमंद, सुरक्षित और शेड्यूल्ड लास्ट-माइल कनेक्टिविटी देने की कोशिश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, Green SM India जैसी कंपनियाँ सेफ्टी टेक्नोलॉजी और ड्राइवर ट्रेनिंग में निवेश करके मेट्रो इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरा करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही हैं।

ये कंपनियाँ इस सिद्धांत पर काम कर रही हैं कि भरोसेमंद ट्रांसपोर्ट एक ऐसी सर्विस है जिसे स्टैंडर्डाइज किया जा सकता है। लक्ष्य एक ऐसा स्मूथ सफ़र बनाना है जहाँ मेट्रो और लास्ट-माइल प्रोवाइडर एक साथ, एक एकीकृत सिस्टम की तरह काम करें। भले ही ये कंपनियाँ अभी प्राइवेट और अनलिस्टेड हैं, इनके ग्रोथ मॉडल शहरी मोबिलिटी सेक्टर के एक बड़े ट्रेंड को दिखाते हैं: घनी शहरी ट्रैफिक के समाधान के तौर पर माइक्रो-मोबिलिटी और इलेक्ट्रिफिकेशन की ओर बढ़ना।

जोखिम और ध्यान देने योग्य बातें

शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर और मोबिलिटी स्पेस पर नज़र रखने वाले इन्वेस्टर्स को कुछ खास डेवलपमेंट पर ध्यान देना चाहिए। सबसे बड़ा जोखिम इसके एग्जीक्यूशन (क्रियान्वयन) का है; हज़ारों छोटी, प्राइवेट ट्रिप्स को मेट्रो सिस्टम की हाई-फ्रीक्वेंसी अराइवल्स के साथ कोऑर्डिनेट करना जटिल है। पब्लिक प्लेसेस में इन प्राइवेट ऑपरेटर्स के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क अभी भी विकसित हो रहे हैं। इसके अलावा, इन लास्ट-माइल सेवाओं की वित्तीय व्यवहार्यता काफी हद तक हाई-वॉल्यूम राइडरशिप और इलेक्ट्रिक फ्लीट्स को बनाए रखने की लागत-प्रभावशीलता पर निर्भर करती है।

इस सेक्टर का अगला बड़ा चरण मल्टी-मॉडल ट्रांजिट सिस्टम्स का सफल इंटीग्रेशन होगा - जहाँ मेट्रो शेड्यूल और लास्ट-माइल व्हीकल की उपलब्धता को सिंक्रोनाइज किया जाएगा। भारत के बढ़ते मेट्रो नेटवर्क की अंतिम सफलता शायद सिर्फ पटरियों और स्टेशनों पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि पॉलिसीमेकर्स और प्राइवेट मोबिलिटी प्रोवाइडर्स यात्रियों की यात्रा के अंतिम कुछ किलोमीटर की समस्या को कितनी प्रभावी ढंग से हल कर पाते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.