### बार-बार क्यों लग रही है आग?
5 मार्च 2026 को दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (DTC) की एक इलेक्ट्रिक बस के पास आग लगने की घटना, जिसमें करीब 15 यात्री सवार थे, भारत के तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक बस फ्लीट में सुरक्षा की लगातार बनी हुई चुनौतियों को उजागर करती है। गनीमत रही कि सभी यात्रियों को सुरक्षित निकाल लिया गया। मगर 2022 से अब तक यह पांचवीं ऐसी घटना है, जो साफ तौर पर सिस्टम की सुरक्षा में बड़ी खामियों की ओर इशारा करती है। ड्राइवर की सूझबूझ और यात्रियों को जल्दी बाहर निकालने के प्रयास ने बड़ी दुर्घटना को टाल दिया, मगर पूरी बस का आग की चपेट में आना कई अंतर्निहित कमजोरियों को दर्शाता है।
### आग लगने की जड़ में क्या है?
एक्सपर्ट्स की मानें तो इलेक्ट्रिक गाड़ियों में आग लगने का सबसे बड़ा कारण "थर्मल रनअवे" है। यह एक ऐसी खतरनाक प्रक्रिया है जहाँ बैटरी के अंदर की गर्मी इतनी बढ़ जाती है कि उसे बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है। इसमें खराब डिज़ाइन वाले बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS), जो बैटरी के तापमान को ठीक से कंट्रोल नहीं कर पाते, एक बड़ी वजह हैं। साथ ही, वायरिंग में गड़बड़ी, मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट या मेंटेनेंस में लापरवाही भी शॉर्ट सर्किट को ट्रिगर कर सकती है। भारत की चिलचिलाती गर्मी, जहाँ तापमान अक्सर 40°C से 50°C तक पहुँच जाता है, इन खतरों को और बढ़ा देती है, क्योंकि यह बैटरी के केमिकल रिएक्शन को तेज कर देती है।
### नियम-कानून और उनका पालन
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए AIS-156 जैसे सुरक्षा मानक मौजूद हैं, जो बैटरी सेल्स, BMS और आग फैलने से रोकने के नियमों को कवर करते हैं। हालांकि, जानकारों का कहना है कि इन नियमों को लागू करने में बड़ी खामियां हैं। IIT दिल्ली की एक स्टडी में DTC बसों में लो-वोल्टेज वायरिंग सिस्टम जैसी कमियां पाई गई थीं। उन्होंने बैटरी हेल्थ, इनवर्टर टेम्परेचर और रिपल करंट की रियल-टाइम मॉनिटरिंग की सिफारिश की थी ताकि खतरे के शुरुआती संकेतों को पकड़ा जा सके। 200 चार्जिंग साइकिल पूरे कर चुकी बसों के लिए फुल मेंटेनेंस चेक की सलाह दी गई है।
### परिचालन और वित्तीयThe
ऐसी घटनाओं का ऑपरेटर्स पर बड़ा वित्तीय बोझ पड़ता है। एक बस का पूरी तरह नष्ट होना एक बड़ा कैपिटल लॉस है। इसके अलावा, ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट (GCC) मॉडल में, जहाँ भुगतान माइलेज के हिसाब से होता है, सर्विस में रुकावट का मतलब सीधा रेवेन्यू लॉस है। इलेक्ट्रिक बसें भले ही डीजल बसों से सस्ती चलें, लेकिन उनकी शुरुआती भारी कीमत, बैटरी बदलने का खर्चा और खास पार्ट्स की मरम्मत का खर्च ऑपरेटर्स की आर्थिक स्थिति पर दबाव डालता है। कुल मिलाकर, शुरूआती निवेश की वजह से इनका टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप (TCO) डीजल बसों से ज्यादा बैठता है। DTC की ई-बसों में पहले भी ऐसी खराबी की खबरें आती रही हैं, जो परिचालन दक्षता पर सवाल खड़े करती हैं।
### आपातकालीन प्रतिक्रिया और समाधान
हालिया घटना में ड्राइवर की तत्परता सराहनीय थी। लेकिन आग लगने के करीब 30 मिनट बाद फायर ब्रिगेड का पहुँचना, तेज प्रतिक्रिया की जरूरत को रेखांकित करता है। ऑपरेटर्स और इमरजेंसी सेवाओं की तुरंत तैनाती से नुकसान को काफी कम किया जा सकता है। खास तरह के अग्निशामक एजेंट जैसे एक्वियस वर्मीकुलाइट डिस्पर्सन (AVD) या F-500, बैटरी सेल को ठंडा करने और थर्मल रनअवे को रोकने में पारंपरिक अग्निशामकों से ज्यादा प्रभावी साबित हो रहे हैं। ट्रांसपोर्ट एजेंसियों और फायर विभागों के बीच बेहतर तालमेल, ताकि ये एजेंट उपलब्ध रहें, बेहद जरूरी है।
### भविष्य पर छाया संकट?
सरकारी योजनाओं जैसे FAME II और PM e-Bus Sewa के बावजूद, इन आग की घटनाओं का बार-बार होना इस सेक्टर के भविष्य पर सवालिया निशान लगाता है। सबसे बड़ा खतरा है जनता के भरोसे का कम होना। अगर ऐसी घटनाएं जारी रहीं, तो यात्री इलेक्ट्रिक बसों को असुरक्षित मानने लगेंगे, जिससे भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है। ऑपरेटर्स के लिए, संपत्ति का नुकसान, रेवेन्यू लॉस और लगातार सख्त मेंटेनेंस की जरूरत एक मुश्किल ऑपरेटिंग माहौल बनाती है। वर्तमान सुरक्षा मानकों का प्रवर्तन इतना मजबूत नहीं लगता कि ऐसी बार-बार की विफलताओं को रोका जा सके, जिससे भविष्य में और कड़े रेगुलेटरी नियम आ सकते हैं। लिथियम-आयन बैटरी की आग से निपटने के लिए खास तैयारी की कमी, जैसे कि शुरुआती चरणों में पारंपरिक अग्निशामकों पर निर्भरता, विनाशकारी नुकसान के जोखिम को बढ़ाती है।
### आगे का रास्ता
इन जोखिमों को कम करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। इसमें निवारक रखरखाव (preventive maintenance) को मजबूत करना, AIS-156 जैसे मानकों के अनुरूप रियल-टाइम बैटरी हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करना, और सुरक्षित वायरिंग तकनीकें अपनाना शामिल है। आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल को बेहतर बनाना, जिसमें खास अग्निशमन एजेंटों की तेज तैनाती शामिल हो, बहुत जरूरी है। ट्रांसपोर्ट एजेंसियों और ऑपरेटर्स को फायर सेफ्टी विभागों और निर्माताओं के साथ मिलकर घटनाओं को तुरंत और प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए मिलकर काम करना होगा। अंततः, इन सुरक्षा चिंताओं को सक्रिय रूप से दूर करना भारत के पब्लिक ट्रांसपोर्ट के विद्युतीकरण की सफलता के साथ-साथ, ग्राहकों का विश्वास बनाने और स्थायी गतिशीलता की ओर समग्र बदलाव को तेज करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।