दिल्ली सरकार ने अपनी नई इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी 2.0 (EV Policy 2.0) का ऐलान कर दिया है। इस पॉलिसी के तहत, **₹7,000 करोड़** के भारी निवेश से चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा दिया जाएगा और पेट्रोल-डीजल वाले कमर्शियल वाहनों को धीरे-धीरे सड़कों से हटाया जाएगा। खास बात ये है कि 2027 तक तीन-पहिया वाहनों (three-wheelers) और 2028 तक दो-पहिया वाहनों (two-wheelers) के लिए फेज-आउट की समय-सीमा तय कर दी गई है।
Detailed Coverage
दिल्ली की सड़कों पर इलेक्ट्रिक क्रांति!
दिल्ली सरकार ने राजधानी में ग्रीन मोबिलिटी को बढ़ावा देने के लिए अपनी महत्वाकांक्षी इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी 2.0 को हरी झंडी दे दी है। इस पॉलिसी का एक अहम पहलू 'कैलेंडर सर्टेनिटी' है, यानी कंपनियों को पता है कि उन्हें कब तक अपने फ्लीट (वाहनों का बेड़ा) को इलेक्ट्रिक में बदलना है। इसके तहत, 1 जनवरी 2027 से पारंपरिक पेट्रोल-डीजल वाले तीन-पहिया और हल्के माल ढोने वाले वाहनों का रजिस्ट्रेशन बंद हो जाएगा। इसके बाद, 1 अप्रैल 2028 से सभी नए दो-पहिया वाहन इलेक्ट्रिक ही होंगे।
चार्जिंग इंफ्रा पर फोकस, ₹7,000 करोड़ का आवंटन
इस बड़े बदलाव को सपोर्ट करने के लिए, सरकार ने चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर खास जोर दिया है। इसके लिए ₹7,000 करोड़ का भारी भरकम फंड आवंटित किया गया है। दिल्ली ट्रांसको को इस इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई है, ताकि काम में देरी न हो। उम्मीद है कि इस रेगुलेटरी क्लैरिटी से मैन्युफैक्चरर्स, लेंडर्स और लॉजिस्टिक्स कंपनियों को नए प्रोडक्शन और फ्लीट एक्सपेंशन के लिए कैपिटल एलोकेट करने में आसानी होगी।
कमर्शियल मोबिलिटी पर खास ध्यान
यह पॉलिसी प्राइवेट कारों के बजाय डिलीवरी वैन, स्कूल बसों और ऑटो-रिक्शा जैसे कमर्शियल ट्रांसपोर्ट पर ज्यादा फोकस करती है। ऐसा इसलिए क्योंकि कमर्शियल वाहन प्राइवेट गाड़ियों के मुकाबले कहीं ज्यादा चलते हैं, यानी उनसे प्रदूषण भी ज्यादा होता है। इन सेगमेंट्स पर पब्लिक फंड खर्च करके, सरकार का लक्ष्य प्रति रुपये खर्च पर प्रदूषण में ज्यादा से ज्यादा कमी लाना है। इस मॉडल को शेन्ज़ेन जैसे शहरों की सफल EV ट्रांज़िशन से प्रेरित होकर बनाया गया है।
ग्रिड मैनेजमेंट और पावर कॉस्ट की चुनौती
हालांकि, इलेक्ट्रिक बसों के बड़े पैमाने पर आने (2030 तक 4,800 से 14,000 होने का अनुमान) से पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ सकता है। अनुमान है कि 2026 तक चार्जिंग लोड 268 MW तक बढ़ सकता है, जिससे पीक आवर्स में ग्रिड ओवरलोड होने का खतरा है और महंगी बिजली खरीदनी पड़ सकती है। इसे मैनेज करने के लिए, पॉलिसी स्मार्ट चार्जिंग सॉल्यूशंस पर जोर देती है, जिससे डिमांड को ऑफ-पीक आवर्स में शिफ्ट किया जा सके।
सरकार मौजूदा पावर कॉन्ट्रैक्ट्स और दोपहर की सोलर एनर्जी का इस्तेमाल करके इलेक्ट्रिक बस डिपो को ग्रिड एसेट्स में बदलना चाहती है। शाम के पीक आवर्स में स्टोर्ड सोलर पावर का इस्तेमाल करके 2030 तक ₹1,000 करोड़ से ज्यादा की लागत बचाई जा सकती है और करीब ₹638 करोड़ की एफिशिएंसी सेविंग्स भी हो सकती हैं। इन्वेस्टर्स अब इस बात पर बारीकी से नजर रखेंगे कि चार्जिंग स्टेशनों की टाइमलाइन कैसे पूरी होती है और पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां इस बढ़े हुए ग्रिड लोड को कितनी अच्छी तरह मैनेज कर पाती हैं।
