Directorate General of Shipping (DGS) ने 8 अप्रैल 2026 को एक अहम निर्देश जारी किया है, जिसके तहत सभी पोर्ट और टर्मिनल ऑपरेटर्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे एक्सपोर्टर्स को मंजूर की गई सभी रियायतों (concessions) का भुगतान सीधे करें।
यह नया नियम पुराने सिस्टम को खत्म करता है जहाँ ये राहतें, जैसे कि डिटेंशन चार्ज, ग्राउंड रेंट और रीफर प्लग-इन फीस में छूट, नॉन-वेसल ऑपरेटिंग कॉमन कैरियर्स (NVOCCs) जैसे बिचौलियों के ज़रिए एक्सपोर्टर्स तक पहुँचती थीं। इस अप्रत्यक्ष प्रक्रिया के कारण अक्सर राहत मिलने में काफी देरी होती थी, जिससे एक्सपोर्टर्स को समय पर वित्तीय मदद नहीं मिल पाती थी। DGS ने यह साफ कर दिया है कि किसी भी तरह के क्लेम या रिइंबर्समेंट के लिए इंतजार नहीं किया जाएगा, बल्कि सभी लाभ सीधे टर्मिनल बिलों पर दिखने चाहिए।
यह फैसला भारत सरकार की ₹497 करोड़ की RELIEF स्कीम से जुड़ा है, जिसे मार्च 2026 में शुरू किया गया था। इसका मकसद वेस्ट एशिया शिपिंग संकट से प्रभावित एक्सपोर्टर्स को क्रेडिट इंश्योरेंस और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट देना है। दरअसल, फरवरी 2026 के अंत से वेस्ट एशिया में बढ़ते संघर्ष ने ग्लोबल शिपिंग लेन, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और लाल सागर (Red Sea) से गुजरने वाले रास्तों को बुरी तरह बाधित कर दिया है। इसके चलते शिपिंग रूट बदलने पड़े हैं, जिससे जहाजों को 10-15 दिन ज़्यादा लग रहे हैं और लागत बेतहाशा बढ़ गई है। फ्रेट रेट्स 3-5 गुना तक बढ़ गए हैं, और इमरजेंसी सर्च चार्ज अब प्रति कंटेनर $2,000 से $4,000 तक पहुँच गया है। वॉर रिस्क प्रीमियम (WRP) भी जहाज़ के मूल्य के 0.01-0.02% से बढ़कर 1% या उससे भी ज़्यादा, कभी-कभी 3% तक हो गया है। इन बढ़ती कीमतों और करेंसी में संभावित उतार-चढ़ाव का सीधा असर एक्सपोर्टर्स पर पड़ रहा है, खासकर उन पर जिनके प्रॉफिट मार्जिन कम हैं। भारत के कुल निर्यात का लगभग 12-13% वेस्ट एशिया क्षेत्र में होता है, जो इसे एक महत्वपूर्ण बाज़ार बनाता है।
इन बढ़ती मुश्किलों से निपटने के लिए, भारत सरकार ने कई कदम उठाए हैं। ₹497 करोड़ की RELIEF स्कीम बेहतर बीमा कवरेज और वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिसमें ₹282 करोड़ विशेष रूप से MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) के लिए रखे गए हैं। सरकार बीमा कंपनियों के लिए सरकारी गारंटी देने पर भी विचार कर रही है, और क्लेम निपटाने के लिए $1.5 बिलियन का रीइंश्योरेंस और कैश फ्लो के लिए एक फंड, साथ ही इंडस्ट्री से $300 मिलियन का फंड बनाने की योजना है। इसका उद्देश्य विदेशी रीइंश्योरर्स पर निर्भरता कम करना और बीमा कंपनियों में विश्वास बढ़ाना है। जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) जैसे पोर्ट्स पहले ही फंसे हुए कंटेनरों के लिए ग्राउंड रेंट और रीफर प्लग-इन चार्ज में छूट जैसे कदम उठाना शुरू कर चुके हैं। मार्च 2026 की शुरुआत से ही एक इंटर-मिनिस्टेरियल ग्रुप (IMG) सप्लाई चेन की मजबूती की निगरानी कर रहा है और रोज़ाना मीटिंग्स कर रहा है।
हालांकि DGS के इस निर्देश से पारदर्शिता और रियायतों के भुगतान में सुधार होगा, लेकिन यह सीधे तौर पर शिपिंग लागत में हुई भारी बढ़ोतरी की मूल समस्या का समाधान नहीं करता। बढ़े हुए फ्रेट रेट्स और वॉर रिस्क प्रीमियम का भारी बोझ अभी भी एक्सपोर्टर्स पर बना हुआ है, जो प्रत्यक्ष रियायतों के फायदे को कहीं ज़्यादा हो सकता है। DGS ने शिपिंग लाइन्स द्वारा माल डायवर्ट करने या अलग पोर्ट पर उतारने पर लगाए जाने वाले अतिरिक्त शुल्कों को भी एक बड़ी चिंता बताया है। RELIEF स्कीम के तहत सहायता का दावा करने के लिए सही कागजी कार्रवाई बेहद ज़रूरी है, वरना यह कोशिशें भी बाधित हो सकती हैं।
DGS का यह आदेश भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए पारदर्शिता और वित्तीय राहत की गति को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नियामक कदम है। सरकार के संयुक्त प्रयास, जिसमें RELIEF स्कीम और बीमा क्षेत्र को समर्थन शामिल है, निर्यात को जारी रखने और मार्केट शेयर की रक्षा करने की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। हालांकि, इन उपायों की प्रभावशीलता भू-राजनीतिक स्थिति के बदलते समीकरणों से लगातार परखी जाएगी। इंटर-मिनिस्टेरियल ग्रुप की लगातार निगरानी और पोर्ट्स तथा शिपिंग लाइन्स के लिए निर्देशों का स्पष्ट और लगातार लागू होना महत्वपूर्ण होगा। यह देखना बाकी है कि क्या एक्सपोर्टर्स बढ़ी हुई शिपिंग और बीमा लागतों का सामना कर पाएंगे, भले ही उन्हें सीधे रियायतें मिलें। यही सवाल 2026 के बाकी हिस्सों में इस क्षेत्र की मजबूती तय करेगा।