DGCA का यह नया आदेश 20 अप्रैल से अमल में आएगा, जिसमें एयरलाइंस को अपनी फ्लाइट सीटों का न्यूनतम 60% यात्रियों को बिना अतिरिक्त शुल्क के उपलब्ध कराना होगा। यह पिछले 20% की सीमा से एक महत्वपूर्ण बढ़ोतरी है। इसके अतिरिक्त, रेगुलेटर यह भी सुनिश्चित करेगा कि जो यात्री एक साथ टिकट बुक करते हैं, वे विमान में एक साथ बैठ सकें। यह कदम यात्रियों की शिकायतों के जवाब में उठाया गया है, क्योंकि सीट चुनने जैसी प्रीमियम सुविधाओं के लिए ₹200 से लेकर ₹2,100 तक की राशि वसूली जा रही थी। DGCA ने स्पोर्ट्स गियर और वाद्य यंत्र (instruments) ले जाने के लिए भी स्पष्ट और पारदर्शी नीतियां बनाने का निर्देश दिया है।
हालांकि, भारतीय एविएशन सेक्टर की प्रमुख एयरलाइंस इस नए नियम से खुश नहीं हैं। इंडिगो (IndiGo), एयर इंडिया (Air India), और स्पाइसजेट (SpiceJet) जैसी बड़ी कंपनियां, जो फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (FIA) के तहत संगठित हैं, ने इसका कड़ा विरोध किया है। उनका तर्क है कि यह नियम उनके लिए गंभीर वित्तीय समस्याएं खड़ी कर सकता है।
यह सब तब हो रहा है जब भारतीय एविएशन सेक्टर पहले से ही भारी वित्तीय नुकसान का सामना कर रहा है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA का अनुमान है कि FY2026 में यह सेक्टर ₹17,000 से ₹18,000 करोड़ तक का घाटा उठा सकता है, जबकि FY2025 में यह घाटा ₹5,600 करोड़ रहने का अनुमान है। एयरलाइंस के लिए, सीट का चुनाव, अतिरिक्त बैगेज, और ऑनबोर्ड बिक्री जैसे 'एंसिलरी रेवेन्यू' (ancillary revenue) ही उनके बिजनेस मॉडल को टिकाए रखने का एक महत्वपूर्ण जरिया हैं। उदाहरण के लिए, इंडिगो ने अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में अपने एंसिलरी रेवेन्यू में 13.6% की वृद्धि दर्ज की, जो टिकट की बिक्री से भी तेज थी। FIA ने जोर देकर कहा है कि सीट चुनने की फीस एयरलाइन की आय का एक 'वैध हिस्सा' है, जो बढ़ती फ्यूल, मेंटेनेंस और एयरपोर्ट फीस जैसी लागतों को पूरा करने के लिए आवश्यक है।
FIA ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय से इस नए डायरेक्टिव को रद्द करने की अपील की है। उनका सबसे बड़ा डर यह है कि 60% सीटें फ्री देने के एवज में एयरलाइंस को अपने बेस टिकट की कीमतों में बढ़ोतरी करनी पड़ेगी। इसका सीधा मतलब है कि वे यात्री भी ज्यादा भुगतान करने पर मजबूर होंगे जो इन अतिरिक्त सेवाओं का लाभ नहीं उठाते। एयरलाइंस इसे 'कमर्शियल ऑपरेशंस में अनावश्यक रेगुलेटरी दखल' बता रही हैं, जिससे बाजार की कीमतें बिगड़ सकती हैं और प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है। जहां सरकार इसे यात्रियों के हित में एक बड़ा कदम बता रही है, वहीं एयरलाइंस का कहना है कि यह कदम बजट यात्रियों और परिवारों के लिए यात्रा को कम किफायती बना सकता है।
लागतों पर अतिरिक्त दबाव तब और बढ़ जाता है जब इंजन संबंधी समस्याओं और वैश्विक सप्लाई चेन की दिक्कतों के कारण एयरलाइंस के 13-15% विमान फिलहाल ग्राउंडेड हैं। लो-कॉस्ट कैरियर्स, जो आमतौर पर कम बेस फेयर रखने के लिए एंसिलरी इनकम पर ज्यादा निर्भर करते हैं, उन पर इस नियम का और भी ज्यादा असर पड़ने की आशंका है। अतीत में, सुप्रीम कोर्ट ने भी पीक टाइम में किराए में भारी बढ़ोतरी को 'शोषण' करार दिया था, ऐसे में एयरलाइंस की प्राइसिंग पर रेगुलेटरी और जुडिशियल नज़रें लगातार बनी रहेंगी।
जहां DGCA का यह नियम सीट के चुनाव को अधिक निष्पक्ष बनाने और परिवारों को साथ बिठाने का लक्ष्य रखता है, वहीं एयरलाइंस की चेतावनियां एक बड़े 'ट्रेड-ऑफ' की ओर इशारा करती हैं। कीमतों में संभावित बढ़ोतरी, फ्री सीटों के वास्तविक फायदे को कम कर सकती है, यानी लागत का बोझ सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट हो जाएगा। यह नया नियम एयरलाइंस की विभिन्न सेवाओं को पेश करने के तरीके को भी सीमित कर सकता है, जिससे प्रतिस्पर्धी बाजार में ग्राहकों के लिए विकल्पों में कमी आ सकती है।
एयरलाइंस 20 अप्रैल से इस नए नियम का पालन करने की तैयारी कर रही हैं, लेकिन इसके वित्तीय प्रभाव पर बहस जारी रहने की उम्मीद है। एयरलाइंस को नियमों का पालन करने और मुनाफा कमाने के बीच एक नाजुक संतुलन बनाना होगा। यह देखना अहम होगा कि क्या यह सेक्टर यात्रा को बहुत महंगा बनाए बिना इस बड़े राजस्व परिवर्तन को सफलतापूर्वक झेल पाता है, जो इसके बिजनेस प्लान की दीर्घकालिक मजबूती को दर्शाएगा।