दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे का एक अहम हिस्सा, राजस्थान में बनी 4.89 किलोमीटर लंबी टनल, जुलाई 2026 तक खुलने की उम्मीद है। इस प्रोजेक्ट में तकनीकी दिक्कतों और देरी के कारण लागत बढ़कर ₹1,250 करोड़ हो गई है।
क्या हुआ?
दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर राजस्थान के कोटा जिले में बनी 4.89 किलोमीटर लंबी, आठ-लेन वाली टनल के जुलाई 2026 के अंत तक खुल जाने की उम्मीद है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के अधिकारियों ने इस अहम हिस्से के लिए यह समय-सीमा पक्की की है। यह टनल 8.3 किलोमीटर लंबे उस हिस्से का हिस्सा है जो मुकुंद्रा हिल्स टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील इलाके से होकर गुजरता है। यह एक्सप्रेसवे, जो दिल्ली और मुंबई के बीच यात्रा के समय को काफी कम करने का लक्ष्य रखता है, के संचालन के लिए यह हिस्सा बेहद जरूरी है।
प्रोजेक्ट की लागत और देरी
इस टनल का निर्माण दिलीप बिल्डकॉन (Dilip Buildcon) और ऑल्टिस-होल्डिंग कॉर्पोरेशन (Altis-Holding Corporation) के एक जॉइंट वेंचर (Joint Venture) ने किया था। प्रोजेक्ट को जनवरी 2024 तक पूरा होना था, लेकिन इसमें कई बड़ी रुकावटें आईं। इंजीनियरिंग की मुश्किलें, खासकर खुदाई के दौरान पानी का बहुत ज्यादा अंदर आना और बारिश, के कारण डिजाइन में बड़े बदलाव करने पड़े ताकि यह स्ट्रक्चर अलग-अलग तरह की चट्टानों में भी स्थिर रह सके। इन दिक्कतों और डिजाइन बदलने में लगे समय के कारण, प्रोजेक्ट की कुल लागत अनुमानित ₹1,000 करोड़ से बढ़कर ₹1,250 करोड़ हो गई।
निवेशक इन देरी पर क्यों नज़र रखते हैं?
दिलीप बिल्डकॉन जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए, मुश्किल इलाकों या पर्यावरणीय मंजूरी वाले प्रोजेक्ट्स में एग्जीक्यूशन (execution) का जोखिम हमेशा बना रहता है। देरी से रेवेन्यू (revenue) मिलने और माइलस्टोन पेमेंट्स (milestone payments) में भी देर हो सकती है। ऐसे जटिल इंजीनियरिंग कामों को सफलतापूर्वक पूरा करना कंपनी की साख और फाइनेंशियल परफॉरमेंस (financial performance) के लिए बहुत जरूरी होता है। पब्लिक-प्राइवेट प्रोजेक्ट्स में लागत बढ़ने पर कभी-कभी विवाद या कम प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) हो सकता है, जब तक कि कॉन्ट्रैक्टर (contractor) को बदलाव या अनपेक्षित साइट कंडीशंस (site conditions) के लिए मुआवजा न मिले। निवेशक आमतौर पर यह देखते हैं कि कंपनी इन पुराने प्रोजेक्ट्स को सफलतापूर्वक कैसे निपटा पाती है ताकि वर्किंग कैपिटल (working capital) को फ्री किया जा सके और कर्ज का दबाव कम हो सके।
वन्यजीव और डिजाइन की बाधाएं
प्रोजेक्ट में स्थानीय वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए खास इंजीनियरिंग समाधानों की जरूरत पड़ी। 8.3 किलोमीटर के इस हिस्से में सिर्फ मुख्य टनल ही नहीं, बल्कि खुले रैंप (ramps) और 'कट-एंड-कवर' (cut-and-cover) सेक्शन भी शामिल हैं। इन्हें इस तरह डिजाइन किया गया कि बाघों जैसे वन्यजीव तेज रफ्तार ट्रैफिक से परेशान हुए बिना अपने इलाके में घूम सकें। मुख्य टनल भारत की सबसे चौड़ी टनल में से एक है, जिसकी चौड़ाई 22 मीटर और ऊंचाई 11 मीटर है, जो काम की टेक्निकल कॉम्प्लेक्सिटी (technical complexity) को दर्शाती है।
निवेशकों को आगे क्या देखना चाहिए?
निवेशकों के लिए सबसे अहम बात होगी टनल के खुलने की असल तारीख और राजस्थान व मध्य प्रदेश में एक्सप्रेसवे के इस हिस्से पर ट्रैफिक का सुचारू रूप से शुरू होना। इसके अलावा, स्टेकहोल्डर्स (stakeholders) प्रोजेक्ट की फाइनल लागत के निपटारे और NHAI से पेंडिंग पेमेंट्स (pending payments) की रिलीज पर अपडेट देख सकते हैं। साथ ही, एनालिस्ट्स (analysts) अक्सर यह भी आंकते हैं कि कंपनी तकनीकी देरी के कारण लागत बढ़ने के बावजूद ऐसे प्रोजेक्ट्स पर अपने प्रॉफिट मार्जिन को बनाए रखने में कितनी सक्षम है।
