कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) ने असम में गुवाहाटी और तेजपुर के बीच ₹8,970.20 करोड़ की लागत से 135.87 किमी लंबे फोर-लेन हाईवे को मंजूरी दे दी है। यह प्रोजेक्ट बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) मॉडल पर बनेगा, जिससे यात्रा का समय कम होगा और कनेक्टिविटी मजबूत होगी।
₹8,970 करोड़ का मेगा प्रोजेक्ट मंजूर
कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) ने असम के लिए एक बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर सौगात को हरी झंडी दे दी है। सरकार ने गुवाहाटी और तेजपुर के बीच 135.87 किलोमीटर लंबे फोर-लेन हाईवे के निर्माण के लिए ₹8,970.20 करोड़ के भारी-भरकम निवेश को मंजूरी दी है। यह प्रोजेक्ट बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) टोल मॉडल के तहत बनाया जाएगा। इस मॉडल में, निजी कंपनियां सड़क का निर्माण करेंगी, उसे ऑपरेट करेंगी और टोल वसूलेंगी, जिसके बाद एक तय अवधि में वह सरकार को वापस सौंप दी जाएगी।
प्रोजेक्ट की खासियतें
इस हाई-टेक हाईवे में 5 बड़े बाईपास भी शामिल होंगे, जिनकी कुल लंबाई 58.7 किलोमीटर होगी। ये बाईपास बाईहाटा चारिअली, सिपाझार, खारुपेटिया, डेकियाजुली और तेजपुर जैसे व्यस्त शहरों से ट्रैफिक को दूर ले जाने में मदद करेंगे। इसके निर्माण में 15 बड़े पुल, 30 छोटे पुल, 19 फ्लाईओवर और 46 अंडरपास बनाए जाएंगे।
एक खास बात यह है कि तेजपुर बाईपास पर 4.9 किलोमीटर की इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) भी होगी, जिसे भारतीय वायु सेना के साथ मिलकर बनाया जा रहा है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। साथ ही, हाथियों की सुरक्षा के लिए एक एलीफैंट अंडरपास भी डिजाइन किया गया है।
इकोनॉमी और कनेक्टिविटी पर असर
यह नया हाईवे मौजूदा NH-27 पर ट्रैफिक का दबाव कम करेगा। यह 8 पीएम गति शक्ति इकोनॉमिक नोड्स, इंडस्ट्रियल पार्क, लॉजिस्टिक्स हब, बड़े एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशनों को जोड़ेगा। इससे व्यापार और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा, काजीरंगा नेशनल पार्क और मां कामाख्या मंदिर जैसे पर्यटन स्थलों तक पहुंच आसान होगी, साथ ही दरंग और उदलगुड़ी जैसे आकांक्षी जिलों की कनेक्टिविटी भी सुधरेगी।
निवेशकों के लिए क्या है?
BOT मॉडल में, टोल कलेक्शन से कंपनियों को लंबे समय तक रेवेन्यू मिलता है, लेकिन ट्रैफिक का रिस्क भी उन्हीं पर होता है। अगर उम्मीद के मुताबिक ट्रैफिक नहीं मिला, तो प्रोजेक्ट की वित्तीय व्यवहार्यता प्रभावित हो सकती है।
साथ ही, बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट्स में अक्सर जमीन अधिग्रहण में देरी, क्लीयरेंस की लंबी प्रक्रिया और लागत बढ़ने जैसे जोखिम भी होते हैं। इसलिए, निवेशक इस प्रोजेक्ट की टेंडर प्रक्रिया और सफल बोली लगाने वाली कंपनियों पर नजर रखेंगे कि वे इन जोखिमों को कैसे संभालते हैं।
