वाराणसी के विकास को एक बड़ा बूस्ट मिलने वाला है! कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) ने शहर में ₹25,446 करोड़ की लागत से बनने वाले दो बड़े एलिवेटेड हाईवे प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दे दी है। ये NHAI के नेतृत्व वाले प्रोजेक्ट हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल (HAM) के तहत बनाए जाएंगे और इनका मकसद ट्रैफिक जाम को कम कर धार्मिक और आर्थिक केंद्रों तक कनेक्टिविटी बढ़ाना है।
क्या हैं ये बड़े प्रोजेक्ट्स?
सरकारी सूत्रों के अनुसार, CCEA ने वाराणसी में कुल ₹25,446 करोड़ के दो अहम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है। इन प्रोजेक्ट्स को नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) संभालेगी और इनका लक्ष्य शहर के रोड नेटवर्क को आधुनिक बनाना है।
गंगा किनारे का एलिवेटेड कॉरिडोर: इसमें सबसे बड़ा निवेश, यानी ₹14,447.64 करोड़, 46.04 किलोमीटर लंबे छह-लेन एलिवेटेड कॉरिडोर के लिए रखा गया है। यह कॉरिडोर गंगा नदी के किनारे बनेगा और नेशनल हाईवे-19 को वाराणसी रिंग रोड से जोड़ेगा। इसमें एक खास केबल-स्टेड ब्रिज भी शामिल होगा।
वरुणा एक्सप्रेसवे: दूसरा प्रोजेक्ट, वरुणा एक्सप्रेसवे, 43.2 किलोमीटर लंबा होगा और वरुणा नदी के किनारे बनेगा। इसे NH-31 को शहर की रिंग रोड से जोड़ने पर फोकस किया जाएगा और इसमें ₹11,000 करोड़ के आसपास का निवेश होगा।
हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल (HAM) का क्या मतलब?
ये दोनों प्रोजेक्ट हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल (HAM) पर आधारित होंगे। इस मॉडल में, सरकार कंस्ट्रक्शन के दौरान प्रोजेक्ट की 40% लागत का भुगतान करती है, जबकि बाकी निवेश और शुरुआती ऑपरेशन की जिम्मेदारी डेवलपर की होती है। निवेशकों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पारंपरिक मॉडल की तुलना में प्राइवेट डेवलपर पर वित्तीय जोखिम को कम करता है, हालांकि डेवलपर को पूंजीगत खर्च और समय-सीमा का ध्यान रखना होता है।
शहर और अर्थव्यवस्था पर असर
वाराणसी में सालाना करीब 15 करोड़ पर्यटक आते हैं, जिससे मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी दबाव रहता है। इन नए कॉरिडोर से यात्रा का समय काफी कम हो जाएगा। उदाहरण के लिए, NH-19 और काशी रेलवे स्टेशन के बीच की यात्रा 50 मिनट से घटकर 25 मिनट रह सकती है। इसका सीधा फायदा टूरिज्म और रीजनल बिजनेस को मिलेगा। ये प्रोजेक्ट पीएम गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान के तहत भी हैं, जिसका उद्देश्य एयरपोर्ट, पोर्ट और अन्य महत्वपूर्ण जगहों तक मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना है।
आगे क्या?
इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों को आने वाली टेंडर्स, कंस्ट्रक्शन कंपनियों के चुनाव और उनके ऑर्डर बुक पर पड़ने वाले असर पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, इन प्रोजेक्ट्स की सफलता काफी हद तक जमीन अधिग्रहण, स्थानीय नियमों और ठेकेदारों की पूंजी जुटाने की क्षमता पर निर्भर करेगी। बड़ी कंस्ट्रक्शन फर्मों के लिए यह एक बड़ा अवसर है, लेकिन स्टील और सीमेंट जैसी चीजों की कीमतों में उतार-चढ़ाव उनके मुनाफे पर असर डाल सकता है।
